पूर्णकालिक स्कूल – क्या हम अपने बच्चों को रोबोट बना देना चाहते हैं? – 8 जुलाई 2013

बच्चे

जब हम जर्मनी में थे, मैंने कई लोगों से सुना कि वहां अब पूर्णकालिक स्कूल खुल गए हैं जो प्राथमिक कक्षाओं से ही शुरू हो जाएंगे। निश्चय ही ऐसे कदम उठाने वाला जर्मनी पहला देश नहीं है। अमरीका और फ्रांस जैसे कई दूसरे देशों में कई सालों से पूर्णकालिक विद्यालय हैं। जर्मनी के विभिन्न इलाकों में रहने वाले अपने मित्रों से बात करते हुए मेरे भीतर कई तरह के विचार आए, जिन्हें मैं क्रम से, आज और आगे आने वाले दिनों में आपके सामने रखूँगा। सबसे पहले तो मैं यही कहूँगा कि, "यह एक खौफनाक बात है!"

वास्तव में जब मैं सुनता हूँ कि एक सात साल का बच्चा सबेरे 8 बजे स्कूल जाता है और वहां देर शाम तक यानी पांच या छः बजे तक रहता है तो मुझे लगता है कि यह बच्चों के साथ किया जाने वाला भयंकरतम अत्याचार है। अपने बचपन को याद करता हूँ तो पाता हूँ कि हम लोग घंटों घरों की छतों पर खेला करते थे, नदी किनारे हुड़दंग मचाते थे या यूं ही सड़कों पर मटरगश्ती किया करते थे। आजकल के ये बच्चे इनमें से किसी भी बात का मज़ा नहीं ले सकते!

नए-नए खेल रचने में और नयी तरह से समय का उपयोग करने में वे हमारी पीढ़ी जैसी मौलिकता और रचनाशीलता विकसित करने में असमर्थ रहते हैं क्योंकि उनका पूरा वक़्त पूरी तरह व्यवस्थित और बंधा हुआ होता है। मैं जानता हूँ की पूर्णकालिक स्कूल का यह अर्थ नहीं होता कि सारा दिन वे अपनी कुर्सियों से चिपके रहते हैं। यह भी कि शिक्षक इस तरह से प्रशिक्षित होते हैं कि वे बच्चों के साथ रहते हैं; उनके साथ खेलते हैं, गीत-संगीत भी होता है और उन्हें पूरी तरह से मौज-मस्ती के साथ समय बिताने का मौका मिलता है। लेकिन फिर भी, यह एक तरह का ढांचाबद्ध (संरचनाबद्ध) और आयोजित कार्य होता है और सब एक ढर्रे पर चलता रहता है। उन्हें कहा जाता है कि आप अपनी रचनात्मकता का उपयोग करें लेकिन इसके बावजूद वह एक खास दिशा में निर्देशित काम होता है, उन्हें अपने मन से कुछ भी करने की स्वतन्त्रता नहीं होती।

इस तरह बच्चे बहुत जल्दी यह सीख जाते हैं कि कैसे वे इस व्यवस्था का हिस्सा बन जाएँ। कैसे सुचारु रूप से चल रहे मशीनी समाज का एक छोटा सा पुर्जा बन जाएँ और अपना काम व्यवस्था की अपेक्षाओं के अनुरूप करते रहें। सारा सप्ताह नियोजित होता है और सप्ताहांत में ही यह अवसर मिल पाता है जब वे अपने परिवार के साथ घर के वातावरण के साथ एकरूप हो सकें और आपस में संवाद कर सकें। पहले शिक्षा अभिभावकों की ज़िम्मेदारी भी हुआ करती था लेकिन अब बच्चे अपने शिक्षकों के साथ इतना समय गुजारते हैं कि यह पूरी तरह उन्हीं का काम हो जाता है। स्वाभाविक ही, कोई भी शिक्षक इतनी अधिक ज़िम्मेदारी अपने सिर लेने में आनाकानी करते हैं और बच्चों का नुकसान होता है!

मैं यह भी जानता हूँ कि कुछ दूसरे देशों में यह तरीका कई वर्षों से अपनाया जा रहा है। इन देशों के लोग बताते हैं कि यह तरीका अच्छी तरह से काम कर रहा है, बच्चे खुश हैं और वे काफी मौज-मस्ती करते हुए अपनी पढ़ाई पूरी करते हैं। लेकिन मैंने यह भी देखा है कि उन देशों में बच्चों को स्कूल में बहुत ज़्यादा दबाव सहन करना पड़ता है। यह हो सकता है कि आधे बच्चे इस व्यवस्था से तालमेल बना पाते होंगे, परिस्थितियों के अनुसार अपने आप को ढाल पाते होंगे। लेकिन मैं कई अभिभावकों से मिला हूँ जो अपने बच्चों के लिए बहुत चिंतित रहते हैं। स्कूल से आने के बाद वे इतनी बुरी तरह से थके हुए होते हैं कि न तो खेलना चाहते हैं न कोई दूसरा काम करना चाहते हैं। सिर्फ टीवी के सामने बैठ जाते हैं। उनमें ऊर्जा नहीं बचती और डॉक्टर के पास जाना एक रोज़मर्रा का काम बन जाता है और इसके लिए भी समय निकाल पाना मुश्किल होता है। इतने तनावों और दबावों से उनकी प्रसन्नता काफ़ूर हो जाती है वे अवसादग्रस्त और चिंताग्रस्त बने रहते है। वे ADHD से ग्रसित हो जाते हैं, जो मतिभ्रम से संबन्धित बीमारी है और जो पहले ही बच्चों में बहुतायत से पायी जाती है।

मेरी नज़र में बच्चे इस उम्र में वैसे भी बहुत दबाव में रहते हैं, उन पर और ज़्यादा दबाव डालना बिल्कुल उचित नहीं है। इस व्यवस्था में कक्षाएँ इतनी बड़ी हो जाती हैं कि हर बच्चे पर व्यक्तिगत ध्यान देना किसी भी शिक्षक के लिए संभव नहीं है। अभिभावकों के सामने भी इन बातों के लिए समय नहीं होता। बचपन, जिसे मौज मस्ती, खेल कूद, दौड़-भाग और दुनिया के आश्चर्यों की खोज के आनंद में व्यतीत होना चाहिए, विकास के कुछ मानदंडों को हासिल करने के चक्कर में, आयोजित, बंधे-बँधाये और बेहद उबाऊ सालों में बदल जाता है। फिर, वे जो इन लक्ष्यों को हासिल करने में कठिनाई महसूस करते हैं, पाते हैं कि वे अपने घनिष्ठ मित्रों के साथ ही एक अजीब सी कटु प्रतिस्पर्धा में उलझ गए हैं।

अब इस आपाधापी में प्रेम के लिए क्या स्थान हो सकता है?

कल और उसके बाद कुछ दिन, मैं इसी विषय पर कुछ और विस्तार के साथ अपने विचार प्रस्तुत करूंगा।

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