भारतीय और पश्चिमी बच्चों के खेलों की तुलना – 12 जून 2013

यूनिसेफ द्वारा घोषित अमीर देशों के बच्चों के लिए आवश्यक सुविधाओं की सूची पर मैंने कल से लिखना शुरू किया था। दो या उससे अधिक सुविधाओं से वंचित यूरोपीय बच्चों को यूनिसेफ ने गरीब घोषित किया है। भारत की परिस्थिति से मैं बिन्दुवार उनकी तुलना कर रहा हूँ।

6. फुरसत के समय नियमित व्यायाम के साधन और सुविधाएं, जैसे तैरना, वाद्य बजाना या युवा संगठनों में कार्य की सुविधा

यह पहली सुविधा है जिसे मैं मानता हूँ कि वह यूरोपीय देशों में तो आवश्यक हो सकती है मगर भारत में उनकी आवश्यकता ही नहीं है। पश्चिमी देशों, यूरोप और अमरीका और आस्ट्रेलिया में कई वर्ष तक यात्राएं करने के कारण मैं जानता हूँ कि वहाँ बच्चे अधिकांश समय घर में रहते हैं, टीवी के सामने बैठे रहते हैं और उनका इधर-उधर घूमना-फिरना बहुत कम होता है। यह गरीबी की समस्या नहीं है। बच्चों को कभी-कभार वैसे ही बाहर निकलकर खुली हवा में घूमने-फिरने और कई दूसरे कामों में मन लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इसके विपरीत, भारत में बच्चे सारा दिन बाहर ही रहते हैं। हो सकता है खेलने की, तैरने की और कुछ सीखने की उतनी संगठित सुविधाएं भारत में बच्चों को प्राप्त न हों मगर बच्चों को उनकी आवश्यकता भी नहीं होती। वे बाहर निकलते हैं, यार-दोस्तों से मिलते-जुलते हैं, सड़क पर खेलते-कूदते हैं और जो कुछ भी उन्हें दिखाई देता है या मिल जाता है उसी का उपयोग खेल और मनोरंजन के लिए कर लेते हैं। जब हम छोटे थे, नदी किनारे बहुत सारे दूसरे लड़के हमें मिल जाते थे जिनके साथ हम दिन भर तैरते रहते थे। हमारे आश्रम के बच्चों को सिर्फ एक गेंद चाहिए या ज़्यादा से ज़्यादा एक क्रिकेट बैट, और वे दिन भर खेलते रह सकते हैं। इतने सारे खेल हैं जिनमें बहुत सारे साजो-सामान की ज़रूरत नहीं होती। एक लाठी, जूता या कुछ भी न हो तो भी काम चल जाता है। भारत में इतनी अधिक तादात में बच्चों का होना भी इसका कारण हो सकता है। जर्मनी में मैंने पाया है कि बच्चों को साथ के लिए बराबरी के बच्चे मिलना कितना मुश्किल होता है इसलिए अगर उनके लिए खेलने या किसी दूसरी गतिविधि के लिए यूथ क्लब या बच्चों के संगठन न हों तो वे अकेलापन अनुभव कर सकते हैं। भारत की आबादी इतनी ज़्यादा है कि आपको बच्चों की कमी कभी भी महसूस नहीं हो सकती। सड़क पर, मैदानों में, नदी किनारे, सब जगह हर उम्र के बच्चे खेलने या दूसरी गतिविधियों के लिए मिल जाएंगे।

7. बंद कमरों में खेलने के उपकरण और सुविधाएं (कम से कम प्रति शिशु एक, बच्चों के शिक्षाप्रद खिलौने, बिल्डिंग ब्लोक्स, बोर्ड गेम्स, कंप्यूटर गेम्स आदि.

इस बिन्दु पर कुछ लिखने के लिए मुझे थोड़ी सी दिमागी मशक्कत करनी पड़ी। इसलिए नहीं कि मुझे इस बात का शक है कि यह बिन्दु भारत के संदर्भ में प्रासंगिक है या नहीं, बल्कि इसलिए कि मैं इस जटिल बात को बेहतर ढंग से रखना चाहता हूँ जिससे आप उसे ठीक तरह से समझ सकें। यूनिसेफ ने उदाहरण देते हुए ‘शिक्षाप्रद’ शब्द का उपयोग किया है। बात यह है कि इससे उसका क्या मतलब हो सकता है? भारत में भी हर सक्षम परिवार अपने बच्चों को उसके लायक खिलौने देने की कोशिश तो करता ही है। गरीब परिवारों में यह फटे कपड़ों से बनाई जाने वाली गुड़िया हो सकती है। बच्चे के पास खिलौना होगा लेकिन क्या वह ‘शिक्षाप्रद’ है? तब फिर अभिभावकों की शिक्षा का प्रश्न उपस्थित हो जाता है। एक गुड़िया बच्चों को बहुत सी बातें सिखा सकती है लेकिन तभी जब बच्चों को गुड़िया देने वाले अभिभावक उन्हें कुछ सिखा सकें!

इसके अलावा, घर और बाहर का विचार ही भारत में, जहां जर्मनी या पश्चिमी देशों के अनिश्चित मौसम के मुक़ाबले गर्मी बहुत ज़्यादा पड़ती है, कुछ दूसरा ही है। जहां एक जर्मन बच्चे के लिए बिल्डिंग ब्लोक्स आवश्यक हो सकते हैं, भारतीय बच्चा, मान लीजिए एक गरीब मजदूर का बच्चा, किसी भवन निर्माण की साइट पर बैठकर वास्तविक ईंटों और पत्थरों के टुकड़ों से यही काम ले सकता है और अपना मनोरंजन कर सकता है।

इस परिभाषा के अनुसार भारतीय बच्चों के लिए भी ये खिलौने उतने ही आवश्यक हैं मगर गरीब से गरीब बच्चे के लिए भी यह सुविधा भारत में उपलब्ध होती है!

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