बच्चे, सिरदर्द हैं या आनंद और हंसी-खुशी के शिक्षक?- 16 सितंबर 2013

बच्चे

20 माह के एक बच्चे का पिता होने के कारण, पाँच से चौदह साल तक के बहुत से बच्चों के साथ रहते हुए और सबसे खास बात, लगभग 180 बच्चों का प्राथमिक स्कूल चलाते हुए, बच्चों के प्रति लोगों के नज़रिये और बच्चों के साथ उनके व्यवहार को ताड़ते रहने की मेरी सहज प्रवृत्ति बन गई है। एक बात मैंने कई बार नोटिस की है: ऐसे लोग भी हैं जो किसी भी उम्र के बच्चों के साथ कतई शालीनता से पेश नहीं आते! यह बात मेरी समझ से बिलकुल बाहर है।

एक उदाहरण लें: हमारे बच्चे, जब भी उन्हें समय मिलता है और धूप नहीं होती, बाहर बगीचे में क्रिकेट खेलना पसंद करते हैं। वैसे तो हमारा बगीचा बहुत बड़ा है मगर लड़कों के स्ट्रोक्स भी तो काफी जानदार होते हैं और कभी कभार गेंद हमारी बाउंड्री वाल लांघकर पड़ोसी के बगीचे में चली जाती है। तो क्या हुआ, आप पूछेंगे; बस दीवार फांदकर गेंद उठाकर ले आना है। अगर आप चाहते हैं कि आप पड़ोसियों की नज़रों में शालीन और सभ्य दिखाई देना चाहते हैं तो सामने से जाकर उनकी कालबेल बजाएँ और पूछें कि क्या मैं आपके बगीचे में जाकर अपनी गेंद ले आऊँ। कोई भी खेलते बच्चों को मना नहीं करेगा!

लेकिन, यह आप सोचेंगे! दुर्भाग्य से हर वयस्क आपके विचार से सहमत नहीं होगा। जब एक दिन हमारे बच्चे खाली हाथ वापस लौटे तो हमने पूछा कि क्या हुआ, क्या गेंद गुम गई? हमारे सम्माननीय पड़ोसी ने जो कहा था, लड़कों ने हमें बताया: "मैं तुम्हारी गेंद कहीं और फेंक दूंगा मगर तुम्हें नहीं दूंगा! चलो, भागो यहाँ से!"

शालीनता की हद है! है न?

यह पहली बार नहीं है जब मैं ऐसी बात सुन या देख रहा हूँ। कुछ लोग बच्चों के प्रति हृदयहीन होते ही हैं और मैं सोचता हूँ कि आखिर ऐसे लोग भीतर क्या महसूस करते होंगे! क्या आपके बच्चे नहीं हैं? क्या वे दूसरों के बच्चों से किसी भी तरह से अलग दिखाई पड़ते हैं? और अगर आपके बच्चे नहीं हैं तो क्या भतीजे-भतीजियाँ नहीं हैं? रिश्तेदारों के या दोस्तों के बच्चे नहीं हैं? चलो, अगर आपके आसपास कहीं भी बच्चे नहीं हैं तो क्या आप भूल गए कि आप जब बच्चे थे तब क्या किया करते थे?

मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि हमारे बच्चों के लिए यह कोई बहुत बड़ी दुर्घटना थी या इस घटना के बाद वे जीवन भर के लिए शोक में डूब जाएंगे। हमने उन्हें तुरंत ही नई गेंद खरीदकर दे दी और उन्हें समझा दिया कि आगे से गेंद बाउंड्री के बाहर नहीं जानी चाहिए और अगर ऐसा हुआ तो आगे से गेंद नहीं मिलेगी। उन्होंने बताया कि इसी तरह कम से कम 20 गेंदें उनके बगीचे में पहुँचकर गायब हो चुकी हैं। वह ‘सन्यासी’ है इसलिए उसने विवाह नहीं किया है, बाल-बच्चे नहीं हैं। स्पष्ट ही, सब कुछ अपने में समो लेने वाले प्रेम तक भी उनकी पहुँच नहीं है! मैं इस व्यक्ति की और बच्चों के बारे में इसी तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त करने वालों की मानसिकता को लेकर हैरान हूँ। आप उनके बारे में क्या सोचते हैं?

जब मैं किसी बच्चे की तरफ देखता हूँ तो मैं उसकी आँखों से झाँकती सहज उत्सुकता को देखता हूँ। मैं ऐसी जगह उनकी हंसी देखता हूँ, जहां मैं हंसी की कोई बात सोच भी नहीं पाता, क्योंकि मैं उस दृश्य को देखने का आदी हो चुका हूँ! ऐसी चीजों पर उनमें उत्तेजना दिखाई देती है जो मेरे लिए दैनंदिन की बातें हो चुकी हैं। उनमें मैं विचारों की स्पष्टता पाता हूँ, जब कि हम अपनी बातों को जटिल बनाकर पेश करने का आदी हैं। क्या यह देखना कमाल की बात नहीं है कि चीज़ें कैसी हो चुकी हैं और याद करना कि पहले वे कैसी थीं?

जब आप बच्चों के साथ अपना समय बिताते हैं तो वे आपको इन सब चीजों और दूसरी बहुत सी बातों का स्मरण कराते हैं! अगर आप उन सब बातों से नीचे उतर आएँ, जो आपको ‘वयस्क’ बनाती हैं तो फिर आप भी छोटे-मोटे चुटकुलों पर भी उनके साथ खुलकर हंस सकेंगे, अपने कपड़े और हाथ-पैर गंदे कर लेंगे और किसी खेल पर मंत्रमुग्ध हो जाएंगे और इन सब भावनाओं से उपजी मित्रता का, उम्र के बावजूद, अनुभव करेंगे और अनुभव करेंगे एक तरह के संतोष का, जो ऐसा करने से प्राप्त होता है।

दुर्भाग्य से, जो लोग बच्चों को परेशानी या सिरदर्द मानते हैं, वो इन सभी खुशियों से महरूम रह जाते है!

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