सिर्फ रहने के स्थान के बदले में दिन भर मजदूरी करना – हमारे स्कूल के बच्चे – 22 जनवरी 2016

परोपकार

आज फिर शुक्रवार है और इसलिए अपने स्कूल के बच्चों से आपका परिचय करवाने का दिन। आज मैं आपको रौशनी और उसके छोटे भाई कृष्णकांत से मिलवाना चाहता हूँ। रौशनी ग्यारह साल की और कृष्णकांत नौ साल का है और दोनों ही दो साल से हमारे स्कूल के विद्यार्थी हैं।

जब हम उनके घर पहुँचे तो बाहर से देखकर सबसे पहले हमें बड़ा अचंभा हुआ कि इतने शानदार बंगले में ये लोग कैसे रह रहे हैं। लेकिन जल्द ही उसका कारण स्पष्ट हो गया: जिन बच्चों से हम बाहर मिल चुके थे और जिनके साथ ही अंदर आए थे, बंगले के भीतर नहीं बल्कि उससे लगे एक कमरे के भीतर निकल गए। वह एक कमरे का अलग फ्लैट है, जिसमें बाथरूम और संडास भी है। उसे देखकर लगता है जैसे उसे नौकरों के लिए ही बनवाया गया है-और फिर हमें पता चला कि वास्तव में तथ्य यही है।

रौशनी की माँ उस बंगले के मालिक के परिवार में नौकरानी है। वह घर की सफाई करती है, खाना बनाती है, परिवार की बूढ़ी माँ की देखभाल करती है और घर भर के कपड़े भी धोती है। अर्थात, घर के लगभग सारे काम वही करती है। बदले में उन्हें बंगले से लगे हुए छोटे से घर में रहने की जगह मिली हुई है।

पहली नज़र में यह एक बढ़िया समझौता प्रतीत होता है लेकिन कुछ देर बाद ही यह स्पष्ट हो जाता है कि उस जगह के किराए के रूप में वास्तव में वे कितनी बड़ी कीमत अदा कर रहे हैं-और तब आपको लगता है कि किसी नियमित नौकरी में होती तो वह महिला इतना काम करके इससे बहुत ज़्यादा कमा सकती थी! इसके अलावा न सिर्फ उसे उस परिवार के लिए खाना बनाना पड़ता है बल्कि अपने परिवार के लिए अलग से राशन खरीदकर फिर से अपने घर में दोबारा वही मशक्कत करनी पड़ती है।

परिवार का राशन, कपड़े-लत्ते और रोज़मर्रा की दूसरी सभी आवश्यक वस्तुएँ रौशनी के पिता की आमदनी से पूरी की जानी ज़रूरी हो जाती हैं। वह बिजली-मिस्त्री है लेकिन स्वतंत्र रूप से काम नहीं करता बल्कि एक ठेकेदार के नीचे काम करता है। लेकिन इसके बावजूद उसकी आमदनी इस पर निर्भर करती है कि ठेकेदार को और उसे कितना काम मिलता है-और जब काम कम होता है तो परिवार के खर्चे मुश्किल से ही पूरे हो पाते हैं और उन्हें किसी तरह अपना काम चलाना पड़ता है!

इसके बावजूद परिवार खुश है। तीन साल पहले, जब उन्हें अपने गृहनगर, फिरोजाबाद में काम मिलना बंद हो गया, वे लोग वृंदावन आ गए थे। उस समय की उनकी आर्थिक स्थिति की तुलना में आज उनकी आर्थिक स्थिति काफी बेहतर है। और फिर हमारे स्कूल का पता चल जाने के बाद स्थिति और बेहतर हो गई क्योंकि उसके बाद से उन्हें बच्चों की स्कूल-फीस, किताब-कापियों और दूसरे पढ़ने-लिखने के सामानों के खर्चों की चिंता भी नहीं करनी पड़ती-फीस नहीं लगती और सारे सामान उन्हें स्कूल से मुफ्त प्राप्त हो जाते हैं।

लेकिन बच्चों को एक बात जो सबसे अच्छी लगती है और जिसका ज़िक्र वे अक्सर करते रहते हैं, वह यह है: यहाँ शिक्षक हर चीज़ बहुत अच्छी तरह समझाकर पढ़ाते हैं और बच्चों को वे मारते-पीटते भी नहीं!

रोशनी और कृष्णकांत जैसे बच्चों की सहायता के हमारे महती काम में आप भी अपना योगदान दे सकते हैं! किसी एक बच्चे को या बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करें! शुक्रिया!

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