जब दादी की मृत्यु के कारण आर्थिक समस्याएँ और बढ़ गईं – हमारे स्कूल के बच्चे – 30 मई 2014

परोपकार

आज मैं अपने स्कूल के दो विद्यार्थियों का परिचय आपसे करवाना चाहता हूँ, जिनके नाम लता और राहुल हैं। लता 14 साल की और राहुल 10 साल का है। उनके दो बड़े भाई भी हैं, जिनकी उम्र क्रमशः 18 और 21 साल है।

जब हम लता और राहुल के घर पहुंचे तो हमें पता चला कि एक सप्ताह पहले ही उनकी दादी का देहांत हो गया है। वह उनके पिता की माँ थीं, जो उनके साथ हमेशा से रहती थीं। तो इस तरह यह उनके लिए शोक का समय था और स्वाभाविक ही उनका घर-परिवार परिवर्तन की प्रक्रिया में था। जिस कमरे में मृत शरीर रखा था अंतिम संस्कार के बाद वही कमरा मातमपुर्सी के लिए आए लोगों से भरा रहता था और अब मृत्यु के बाद किए जाने वाले कर्मकांडों के लिए प्रयुक्त हो रहा था।

न सिर्फ भावनात्मक रूप से बल्कि आर्थिक रूप से भी यह उनका कठिन समय था क्योंकि लता का पिता अपनी माँ के शोक के दौरान काम पर नहीं जाता था और इसलिए आय का कोई स्रोत नहीं रहा था। वे लोग वृन्दावन की सरहद पर रहते हैं और शहर में उसकी छोटी सी दुकान है, जहां सभी दर्जी अपना सिलाई का काम-धंधा करते हैं। वह पूरा दर्जी नहीं है बल्कि सिर्फ छोटे-मोटे अदल-बदल के और किनारी और बटन लगाने के काम करता है।

स्वाभाविक ही इस काम में सारा दिन मेहनत करने के बावजूद कोई खास आमदनी नहीं हो पाती। इसलिए जब कुछ माह पहले उनका बड़ा बेटा वेल्डिंग का काम सीखकर कुछ कमाने-धमाने लगा तो यह उनके परिवार के लिए बड़ी राहत का सबब बन गया।

इस तरह, परिवार के दो सदस्यों के सम्मिलित प्रयासों से और साथ ही सबसे छोटे दो बच्चों के लिए हमारे स्कूल की मुफ्त पढ़ाई की बदौलत यह परिवार अपने घर का खर्च किसी तरह चला पाता है, बल्कि अक्सर कुछ बचा भी लेता है। वे कहते हैं, लता के विवाह के लिए यह बचत अत्यंत आवश्यक है। वे मानते हैं कि वह दिन आने में अभी कम से कम चार साल बकाया हैं लेकिन क्योंकि वे हर माह ज़्यादा कुछ बचा नहीं पाते, उनके लिए आवश्यक है कि अभी से यह काम किया जाए, जिससे उसके अच्छे दहेज हेतु पर्याप्त पैसा जुड़ सके। तभी उसके लिए एक अच्छा वर मिल पाना संभव होगा, कोई ऐसा व्यक्ति जिसकी इतनी आय हो कि लता को भी कोई रोजगार न करना पड़े। अभी वह बच्ची है-लेकिन उसके माता-पिता अभी से इस बारे में सोच-सोचकर परेशान हैं!

फिलहाल वह हमारे स्कूल की तीसरी कक्षा में पढ़ रही है और पूरी तरह पढ़ाई में ध्यान लगाती है। वह हमेशा गंभीर नज़र आती है और जब आप उससे बात करने की कोशिश करते हैं तब भी बहुत चुपचाप सी रहती है-लेकिन सहेलियाँ अपवाद हैं! उनके साथ वह खुलती है और फिर एक सामान्य किशोरवय लड़की की तरह बात करती है। बहन की तुलना में राहुल पढ़ाई में उतना अच्छा नहीं है लेकिन वह कक्षा में शरारत भी नहीं करता इसलिए शिक्षिकाएँ उसके बारे में इतना ही बताती हैं कि उसे किसी बात को समझने और आत्मसात करने में थोड़ा ज़्यादा वक़्त लगता है।

हम जानते हैं कि उनकी पढ़ाई-लिखाई ही उन्हें बेहतर भविष्य की ओर ले जाएगी! अगर आप कुछ और बच्चों के लिए इस संभावना को फलीभूत होता देखना चाहते हैं तो हमारे काम में हाथ बंटाइए: एक बच्चे को प्रायोजित करके या स्कूल के बच्चों के एक दिन के भोजन का खर्च वहन करके या फिर कुछ राशि चंदे में देकर!

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