जब ईश्वर अपने सबसे गरीब श्रद्धालुओं की कोई मदद नहीं करता – हमारे स्कूल के बच्चे – 11 अप्रैल 2014

परोपकार

पिछले हफ्ते मैंने आपका परिचय वैशाखी और उसकी बहन, पल्लवी से करवाया था। मैंने बताया था कि वे लोग पश्चिम बंगाल की एक महिला के घर में रहते हैं। जब ये लड़कियां हमारे स्कूल आने लगीं तो वह महिला भी अपने बेटे को भर्ती कराने हमारे स्कूल आ गई। लड़के का नाम सुदीप है और वह 12 साल का है।

सुदीप के माता-पिता भी उसी धंधे में हैं, जिसमें उनके किराएदार हैं: वे भी आसपास के मंदिरों और आश्रमों में कीर्तन आदि करते हैं। जब कि सुदीप की माँ के पास 20 डॉलर यानी लगभग 1200 रुपए प्रतिमाह वेतन वाला पक्का रोज़गार है, उसके पति को कभी-कभार ही मौका मिल पाता है कि वह कुछ कमा सके। उनके लिए यह जानना मुश्किल होता है कि किसी माह में उनकी कितनी आमदनी होगी और इसीलिए उन्होंने अपने मकान के दो कमरे किराए पर उठा रखे हैं, जिससे थोड़ी बहुत नियमित आमदनी होती रहे।

इस घर में रहते हुए उन्हें एक साल हो गए हैं। उन्होंने यह घर थोड़ी-बहुत अपनी जमा-पूँजी और रिश्तेदारों से ऋण लेकर खरीदा था और इस ऋण का बोझ अब भी उन पर बना हुआ है।

जब हमने सुदीप से पूछा कि स्कूल में या आस-पड़ोस में उसके कोई मित्र हैं या नहीं तो उसने कहा कि नहीं हैं, उसकी माँ ने उसे दोस्त बनाने के लिए मना किया है। जब हम आश्चर्य से माँ की तरफ देखते हैं तो हमें यह स्पष्टीकरण प्राप्त होता है: 'फिर वह अपने दोस्तों के घर जाना चाहेगा और पता नहीं वे लोग कैसे हों!' इस तरह वे अपने बच्चे को स्कूल में या घर से बाहर कोई भी सामाजिक सम्बन्ध स्थापित करने से मना करते हैं, जिससे वह किसी गलत सोहबत में न पड़े। यह एक सहज और भोले-भाले दिमाग में आया हुआ समाधान है। वे यह नहीं समझ पाते कि जीवन भर के लिए ये सामाजिक सम्बन्ध कितने महत्वपूर्ण हो सकते हैं!

हालाँकि उसके माता-पिता इस बात को ज्यादा पसंद नहीं करते मगर सुदीप अक्सर अपने पिता की साइकिल लेकर घर के आसपास चलाता रहता है। कभी-कभी साइकिल चलाने की ख़ुशी में कुछ दूर भी निकल जाता है और कभी-कभी तो वहां तक भी, जहाँ हमारे स्कूल के दूसरे बच्चे रहते हैं। बच्चों को आप मित्र बनाने से नहीं रोक सकते!

ये लोग काफी धार्मिक नज़र आते हैं। वे मंदिरों में ही काम करते हैं और इस साल जब वार्षिक परीक्षाएं शुरू हुईं तो सुदीप की माँ कृष्ण भगवान की एक मूर्ति लेकर स्कूल आ गई, जिससे उनका लाड़ला बेटा परीक्षा शुरू होने से ठीक पहले एक बार और उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सके।

बड़ी श्रद्धा-भक्ति और परिश्रम के साथ सालों-साल भजन गाकर और ईश्वर की स्तुति करने के बावजूद इस परिवार की हालत में ज़रा भी सुधार नहीं हुआ है। वे सब मिलकर अभी भी इतना नहीं कमा पाते कि घर की दीवारों पर प्लास्टर करवा सकें। घर में रखा पानी का कूलर टूट चूका है और उसकी जगह एक छोटे से पंखे ने ले ली है। और तो और, देवी यमुना हर साल अपनी बाढ़ से उनके घर का छोटा सा बगीचा तहस-नहस कर देती है। शायद वे अब भी इंतजार कर रहे हैं कि कभी न कभी ईश्वर की कृपा उन पर होगी।

जबकि ईश्वर उन पर खास मेहरबान नज़र नहीं आता, हम हर संभव कोशिश कर रहे हैं कि सुदीप की थोड़ी-बहुत मदद कर सकें, जिससे उसका भविष्य अच्छा हो सके। अभी वह हमारे स्कूल की दूसरी कक्षा में पढ़ रहा है और वह एक अच्छा विद्यार्थी है। शिक्षक उसके शांत स्वभाव और कक्षा में उसकी एकाग्रता से बहुत खुश और प्रभावित हैं।

अगर आप सुदीप जैसे बच्चों की मदद करना चाहते हैं तो किसी बच्चे को प्रायोजित कर सकते हैं या स्कूल के बच्चों के एक दिन के भोजन का खर्च वहन कर सकते हैं। आइये, हम सब मिलकर सुदीप जैसे बच्चों की मदद करें, जिससे उनका भविष्य अच्छा हो सके।

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