बेटी के दहेज़ के लिए जब एक गरीब परिवार अपना घर और खेत गिरवी रखने पर मजबूर हो जाता है – हमारे स्कूल के बच्चे – 5 सितम्बर 2014

परोपकार

आज मैं आपको अपने स्कूल के दो बच्चों से मिलवाना चाहता हूँ: आकाश और रानी। वृन्दावन में वे अभी सिर्फ एक साल से कुछ ही ज़्यादा समय से रह रहे हैं- लेकिन इतने कम समय में ही उन्हें कई बार घर बदलना पड़ा है!

रानी नौ साल की है और अपने परिवार की दूसरी सबसे छोटी सदस्य है। छह बच्चों के परिवार में आकाश सबसे छोटा बच्चा और एकमात्र लड़का है। एक बार फिर यह स्पष्ट है कि माता-पिता ने बहुत प्रयत्नों के बाद लड़का पाया है और इस चक्कर में पाँच लडकियाँ पैदा कर बैठे वे तब तक कोशिश करते रहे जब तक कि उन्हें लड़का नहीं हो गया।

यही असमयानुकूल विचारधारा ही अब उनकी बुरी हालत का कारण बन गई है, बल्कि सारी परेशानियों की जड़ वही है! उनकी सबसे बड़ी बेटी पिछले साल 18 साल की हो गई और उसी साल उसके जन्मदिन के तुरंत बाद उन्होंने उसका विवाह तय कर दिया है। उसके दहेज़ के इंतज़ाम के लिए उन्हें अपना खेत गिरवी रख देना पड़ा है, जोकि उस समय तक उनकी आजीविका का एकमात्र ज़रिया था!

एक किसान के पास, जिसके खेत उनके खेत से लगे हुए हैं, अपना खेत गिरवी रखकर उन्हें 830 यू एस $ यानी लगभग 50000 ₹ प्राप्त हुए हैं। जब तक वे उसे 500 $ यानी लगभग 30000 ₹ लौटा नहीं देते वह किसान उनके खेत का उपयोग अपने खेत की तरह करता रहेगा, अर्थात उस खेत से होने वाली आय का कोई हिस्सा उन्हें नहीं मिलेगा। अपने सबसे छोटे तीन बच्चों को लेकर खाली हाथ वे वृन्दावन आ गए कि यहाँ कुछ कमाकर अपना क़र्ज़ चुका सकें और खेत वापस पा सकें। दो सबसे बड़ी लडकियाँ अपने दादा-दादी के साथ मध्य भारत के किसी गाँव में रह रही हैं।

वे बड़ी आशाओं के साथ वृन्दावन आए थे मगर उनकी इच्छानुसार सब कुछ होना इतना आसान नहीं था। अपने एक रिश्तेदार के ज़रिए एक ठेकेदार (भवन निर्माता) के पास रानी के पिता को काम मिल गया। जिसके यहाँ वह काम कर रहा था, उस भवन निर्माता ने जल्द ही उनके सामने एक प्रस्ताव रखा: कुछ समय पहले उसने एक मकान बनवाया था; अगर वे उसे साफ़-सुथरा रखें और उसकी देख-रेख करें तो वे बिना किराया चुकाए वहाँ रह सकते हैं। स्वाभाविक ही, वे तैयार हो गए। रानी की माँ पड़ोस में रहने वाली एक बूढ़ी महिला का खाना भी बनाने लगी, जिससे उन्हें कुछ अतिरिक्त आय हो जाती थी।

मगर फिर वह मकान बिक गया और भवन निर्माता ने उसे दूसरे मालिक को स्थानांतरित कर दिया। फिर वे ऐसे ही एक दूसरे मकान में आ गए, उसे साफ़ किया और फिर उन्हें वह मकान भी छोड़ना पड़ा। जब हम उनसे मिले, एक ही साल में वे ऐसे तीसरे मकान में रह रहे थे, जो बहुत गन्दा था, उन्होंने उसे साफ़ करके रहने लायक बनाया और अंततः उन्हें छोड़ना पड़ा। भवन निर्माता के लिए यह अच्छा सौदा था- और वे बेचारे भी हर मुफ्त मिलने वाली चीज़ स्वीकार करने के लिए मजबूर थे!

दूसरी जगह आने के बाद माँ का उस वृद्ध महिला के यहाँ खाना बनाने का काम और उसके साथ अतिरिक्त आमदनी का स्रोत नहीं रहा लिहाजा उसे कोई दूसरा काम पकड़ना पड़ा। वह अपने पति के साथ निर्माण-स्थलों पर मजदूरी करने लगी जो बहुत कठिन काम था और शाम तक दर्द के मारे उसका सारा शरीर टूटने लगता था।

आज तक वे धेले भर की बचत नहीं कर पाए हैं। दोनों मिलकर 150 $ यानी लगभग 9000 ₹ कमाते हैं मगर कुछ रुपए उन्हें बच्चों के दादा को, जो उनके दूसरे बच्चों की परवरिश कर रहे हैं, भेजने पड़ते हैं। इसके अलावा खाने-कपड़े के रोज़मर्रा के खर्चे तो लगे ही हुए हैं। वे सिर्फ एक बात पर खुश हैं: वे हमारे स्कूल में अपने दो बच्चों को भेज पा रहे हैं, जो दोनों ही मुख्य स्कूली शिक्षा से पहले की कक्षाओं में, अर्थात के जी में पढ़ रहे हैं- और इस पढ़ाई पर उन्हें एक पैसा भी खर्च नहीं करना पड़ता!

और बदले में हम भी खुश हैं कि दो प्रतिभाशाली बच्चों, आकाश और रानी की सहायता कर पा रहे हैं कि वे पढ़-लिखकर अपना भविष्य उज्ज्वल कर सकें! उनकी सहायता के हमारे काम में आप भी सहभागी हो सकते हैं: किसी एक बच्चे को या स्कूल के बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करके!

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