पुरुष तब तक कोई काम नहीं करता जब तक कि ज़रूरी न हो – हमारे स्कूल के बच्चे – 5 जून 2015

आज मैं आपका परिचय हमारे स्कूल में नई-नई भर्ती हुई एक लड़की से करवाना चाहता हूँ, जिसका नाम डॉली है। डॉली पाँच साल उम्र की है और वृन्दावन के एक गरीब इलाके में, जहाँ से बहुत से दूसरे बच्चे भी हमारे यहाँ पढ़ने आते है, अपनी माँ, अपने पिता और एक भाई सहित एक संयुक्त परिवार में रहती है।

डॉली के घर में प्रवेश करते ही, सबसे पहले तो यह समझना पड़ता है कि कौन कौन क्या है? जैसा कि अधिकतर भारतीय घरों में देखने को मिलता है, उस संयुक्त परिवार के विभिन्न सदस्य घर में मौजूद हैं और उनके अलावा पड़ोसियों के कुछ जिज्ञासु बच्चे भी। आखिर बड़ी मुश्किल से हम चीजों को समझने में कामयाब होते हैं: घर में पाँच कमरे और एक बड़ा सा आँगन भी है। यह डॉली के दादा-दादी का घर है और डॉली का पिता उनके चार बच्चों में सबसे बड़ा लड़का है। उनका दूसरा बेटा भी शादीशुदा है, इस तरह उस घर में कुल मिलाकर दस लोग रहते हैं।

आगे और पूछने पर हमें पता चलता है कि डॉली के परिवार के पास सिर्फ एक कमरा है और सारे परिवार की आमदनी का बटवारा हो चुका है अर्थात, डॉली के पिता को अपने खर्चे पूरे करने के लिए खुद कमाना पड़ता है। पारंपरिक परिवारों के लिहाज से, जहाँ सबकी कमाई एक जगह इकठ्ठा होती है और उसमें से अपनी-अपनी ज़रूरतों के मुताबिक सब निकालते रहते हैं, यह आम बात नहीं है।

लेकिन आजकल यह बहुत असामान्य भी नहीं है। अपने विवाह से पहले सबसे बड़ा भाई कभी कोई पैसा कमाकर नहीं लाता था लेकिन उसके बाद उसके अभिभावकों ने कह दिया कि परिवार की संयुक्त आमदनी में उसे भी कुछ न कुछ कमाकर लाना होगा। बहुत कहने पर उसने मामूली मजदूरी के काम पकड़े लेकिन वास्तव में वह कभी नियमित रूप से काम पर जाता ही नहीं था। इसलिए दो साल पहले तंग आकर डॉली की दादी ने संयुक्त परिवार के नियम में परिवर्तन किया: भविष्य में अपने और अपने परिवार के खर्चे पूरे करने के लिए उसे स्वयं काम करके पैसे कमाने होंगे! तब तक उनके दो बच्चे भी हो चुके थे, डॉली और उसका एक साल का छोटा भाई। और डॉली के दादा-दादी के दो विवाह योग्य लड़के भी थे- वे और पैसे कहाँ से लाते?

इस तरह डॉली के पिता को गंभीरता पूर्वक काम करने के लिए बाहर निकलना पड़ा और खुद पैसे कमाने पड़े। एक मजदूर के रूप में वह अब लगभग 3500 रुपए यानी लगभग 60 डॉलर प्रति माह कमाता है-अधिक काम मिलने पर कुछ ज़्यादा, कम काम होने पर कुछ कम। इस तरह वे बड़ी मुश्किल से किसी तरह अपना खर्च चला पा रहे हैं।

लेकिन यहाँ उनके लिए सबसे बड़ी समस्या डॉली का खराब स्वास्थ्य है। वह टीबी से पीड़ित रही है और पिछले छह माह से दवाइयाँ खा रही है। अभी-अभी उन्होंने उसकी दवाइयाँ बंद की थीं लेकिन फिर उन्होंने नोटिस किया कि उसकी खाँसी फिर शुरू हो गई है-और पाचन शक्ति को लेकर भी उसे बहुत परेशानी है। डॉक्टर की फीस और दवाइयों के खर्च के बाद उनके सामने आर्थिक समस्याएँ मुँह बाए खड़ी हो गई थीं, जिन्हें डॉली की दादी की आर्थिक मदद से दूर किया गया गया। अब उन्हें फिर बार-बार उसकी जाँच के लिए डॉक्टर के पास जाना पड़ता रहेगा।

इसी बीच उन्होंने हमारे स्कूल के बारे में सुना और सौभाग्य से भर्ती शुरू होने की शुरुआत में ही हमारे यहाँ आ गए इसलिए उन्हें डॉली के लिए हमारे स्कूल में जगह मिल गई। इस जुलाई से डॉली हमारे स्कूल में पढ़ने आएगी-पूरी तरह मुफ्त। इससे उसके अभिभावकों का यह बोझ कम हो जाएगा! निश्चित ही हम उसकी डॉक्टरी जाँच की खोज-खबर लेते रहेंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि उसे सुचारू रूप से आवश्यक चिकित्सा मिलती रहे!

अगर आप डॉली जैसे दूसरे बच्चों की मदद करना चाहते हैं तो किसी एक बच्चे को या बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित कर सकते हैं!