आज मैं आपका परिचय दो लड़कों से करवाना चाहता हूँ, जिन्होंने इसी साल से हमारे स्कूल में पढ़ना शुरू किया है: प्रेमशंकर और दीनदयाल। जब उनके गाँव में उनका घर, उसमें रखा सारा सामान और मालमत्ता जलकर स्वाहा हो गया तो उनके परिवार को वृन्दावन आने को मजबूर होना पड़ा।
उनका पिता वृंदावन के लिए अजनबी नहीं था। पिछले 20 साल से वह इस शहर में मजदूर के रूप में काम करता आ रहा था और पहले अकेला ही यहाँ रहता था। फिर उसने विवाह किया और वापस अकेला वृन्दावन आ गया। पहले पत्नी से और बाद में, बच्चे हो जाने के बाद, बच्चों से मिलने समय-समय पर गाँव चला जाया करता था।
पिछले साल जब प्रेमशंकर 10 साल का, दीनदयाल 9 का और उनका एक और भाई, श्यामसुंदर 4 साल का था तो उनके घर में एक दुर्घटना घटित हो गई: खाना बनाते वक़्त चूल्हे की चिंगारी ज़मीन पर रखी घास-फूस पर पड़ी और उनके घर में आग लग गई। आग से किसी को शारीरिक हानि नहीं पहुँची मगर उनका घर, कपड़े-लत्ते और आसपास रखा दूसरा सारा सामान जलकर खाक हो गया।
उसके बाद ही, जब गाँव में उनके पास कुछ न बचा, परिवार के मुखिया यानी बच्चों के पिता ने निर्णय किया कि पत्नी और बाल-बच्चों को लेकर "बड़े शहर", वृन्दावन में रहना ही उचित होगा। इस शहर को वह सुरक्षित नहीं मानता इसलिए उसने मजदूरी का अपना पुराना काम छोड़ दिया और पत्नी के साथ मिलकर एक नया व्यवसाय शुरू किया: सड़क पर चाय की दुकान लगा ली और साथ ही थैलियाँ बेचने लगे।
इस तरह अब उसे पत्नी और बच्चों को घर पर अकेला छोड़ने की ज़रूरत नहीं रही-लेकिन इस व्यवसाय से उसे माह भर में सिर्फ 50 डॉलर यानी लगभग 3000 रुपए ही मिल पाते हैं, जो पाँच लोगों के परिवार को अच्छा जीवन उपलब्ध कराने के लिए काफी नहीं है। अभी वे एक व्यक्ति के घर की पहली मंज़िल पर स्थित एक कमरा किराए पर लेकर रह रहे हैं और उसका संडास, पानी का पंप इत्यादि इस्तेमाल करते हैं और उन्हें मकान मालिक के घर के आँगन से होकर ही आना-जाना पड़ता है। उनकी सारी कमाई कपड़े-लत्ते, भोजन सामग्री और दूसरी आवश्यक वस्तुएँ खरीदने में ही खर्च हो जाती है। बच्चों की पढ़ाई का खर्च उनके लिए अतिरिक्त बोझ हो सकता था, जिसके कारण उन्हें बहुत बड़ी आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता। यहाँ तककि वे बच्चों को पढ़ाने का विचार भी स्थगित कर सकते थे।
कुछ समय पहले तक बच्चे गाँव के एक सरकारी स्कूल में पढ़ते थे और दीनदयाल और प्रेमशंकर कई कक्षाएँ पास कर चुके हैं। हमारे स्कूल में उन्होंने टेस्ट पास किया और अब क्रमशः पहली और अपर केजी में पढ़ते हैं। यह बात पुनः दर्शाती है कि सरकारी स्कूल, विशेष रूप से गाँवों के सरकारी स्कूल अक्सर अच्छी शिक्षा प्रदान नहीं कर पाते!
मुफ्त स्कूल का विकल्प पाकर परिवार बड़ा खुश है क्योंकि यहाँ उन्हें न सिर्फ अच्छी शिक्षा प्राप्त हो रही है बल्कि मुफ्त भोजन भी प्राप्त होता है! शिक्षिकाएँ बताती हैं कि दोनों ही काफी बुद्धिमान हैं-इसलिए हम भी उनकी मदद करके खुश होंगे कि जब तक हमारे स्कूल में हैं, अच्छी तरह पढ़ाई करें, जिससे उनका भविष्य बेहतर हो सके।
अगर आप इन बच्चों की या उन जैसे दूसरे बच्चों की मदद करना चाहें तो हमारे इस काम में सहभागी हों: एक बच्चे को प्रायोजित करके या स्कूल के सभी बच्चों के एक दिन के भोजन का खर्च वहन करके आप ऐसा कर सकते हैं। बच्चे और हम आपको धन्यवाद प्रेषित करते हैं!
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