एक गरीब भारतीय व्यक्ति के लिए बेटी के विवाह का क्या अर्थ होता है – हमारे स्कूल के बच्चे-15 नवंबर 2013

मैं आज आपको दीपक और कैलाश से मिलवाना चाहता हूँ। दीपक दस साल का है और हमारे स्कूल की पहली कक्षा में पढ़ता है। कैलाश चौदह साल का है और चौथी में है। हमारे सभी बच्चों की तरह वे भी गरीब परिवारों से आते हैं। दूसरे लोगों की तरह, उस परिवार की भी सबसे बड़ी चिंता पैसे की किल्लत है। पैसा ही उनकी बड़ी बहन का भविष्य तय करेगा।

उनका पिता साधारण मजदूर है और लगभग चार डालर रोज़ यानी लगभग 250 रुपए रोज़ कमाता है। जब उसे माह भर लगातार काम मिलता रहता है तो वह इतना कमा लेता है कि परिवार का खर्च किसी तरह चल सके लेकिन मजदूरी का काम अनिश्चित और अस्थिर होता है। आज आप एक काम कर रहे हैं मगर हो सकता है कल पैसा कमाने के लिए आपको किसी दूसरी जगह, किसी दूसरे काम की तलाश में निकालना पड़े। इसीलिए कैलाश की माँ भी काम करती है। वह एक स्कूल में सफाई के साथ-साथ दूसरे छोटे-मोटे काम करती है। कक्षाएँ शुरू होने से पहले और उनके समाप्त होने के बाद रोज़ वह कमरे साफ करती है और जब स्कूल चालू रहता है तब शिक्षकों को पानी पिलाने का, छोटे बच्चों को पेशाब कराने का और यहाँ से वहाँ संदेश लाने-ले जाने का काम करती है। माह के उन दिनों में, जब उसके पति के पास काम नहीं होता तब उसकी ज़िम्मेदारी होती है कि वह घर का खर्च चलाए। वह 30 यू एस डालर प्रतिमाह कमाती है जो परिवार का खर्च चलाने में बहुत मददगार साबित होता है।

कुछ समय तक उन्होंने बहुत कोशिश करके प्रति माह कुछ बचत की और राशि को एक बड़े कार्यक्रम के लिए अलग रख छोड़ा: अपनी अठारह वर्षीय सबसे बड़ी बेटी के विवाह के लिए। उनका विचार था कि विवाह के लिए और देर करना ठीक नहीं होगा। कोई शक नहीं कि यह एक आयोजित विवाह (अरेंज्ड विवाह) होगा और परिवार वाले तय करेंगे कि भविष्य में उनका दामाद कौन होगा और उनकी लड़की किस घर में जाएगी। पिछले कई हफ्तों से वे उसके लिए लड़का देख रहे थे और कुछ प्रस्ताव भी उनके पास आए थे लेकिन एक ही समस्या थी, उनके पास पर्याप्त रुपए नहीं थे। आयोजित विवाहों का बाज़ार दूसरे सभी बाज़ारों की तरह ही होता है: अगर आप उत्कृष्ट वस्तु चाहते हैं तो कीमत भी ज़्यादा अदा करनी पड़ती है। एक अच्छे दूल्हे के लिए अच्छा दहेज भी देना पड़ता है! दहेज की प्रथा कानूनन निषिद्ध है मगर जब दूल्हे को जानवरों की तरह खरीदने की यह प्रथा उच्च वर्ग में भी जारी है तो मध्यम और निचला वर्ग क्यों पीछे रहें!

माँ बताती है कि उन्हें अभी हाल ही में एक अच्छे लड़के का प्रस्ताव रुपयों की कमी के चलते अस्वीकार करने पड़ा। लड़का अच्छा था और वे सोचते थे कि उनकी लड़की उस लड़के और उसके परिवार के साथ सुख के साथ रह सकेगी लेकिन लड़के वाले दो लाख रुपये और ऊपर से एक मोटर बाइक की मांग कर रहे थे। सब मिलाकर यह रकम 4000 यू एस डालर या अढ़ाई लाख रुपए होती है। इस गरीब परिवार के लिए यह बहुत बड़ी रकम थी। 3000 डालर या लगभग दो लाख रुपए से ज़्यादा वे इस समारोह पर, जिसमें शादी-हाल का किराया, मेहमानों का प्रीतिभोज और दहेज आदि का खर्च शामिल हैं, खर्च नहीं कर सकते थे।

इसी काम के लिए वे बचत कर रहे थे। वे जानते हैं कि आसपास के लोगों से उन्हें ऋण भी लेना पड़ सकता है लेकिन जहां तक हो सकेगा वे स्वयं सारा खर्च उठाना चाहते हैं। इसी के चलते उनका घर, जो फिलहाल एक कमरा और एक और अर्धनिर्मित कमरा भर है, पूरा नहीं हो पाया। इस दूसरे कमरे पर ऊपर छत नहीं है, दरवाजा लगाया जाना बाकी है और उन्होंने उस हिस्से को एक कंबल से ढँक रखा है।

ऐसी हालत में अगर उन्हें बच्चों के स्कूल की फीस भी देनी पड़े तो उनकी परेशानियाँ और बढ़ जाएंगी। दूसरा उपाय यह हो सकता है कि पढ़ाई का खर्च उठाने की जगह वे बच्चों को स्कूल ही न भेजें, भले ही बच्चे अपढ़ रह जाएँ। अभी वे हमारे स्कूल में मुफ्त शिक्षा पा रहे हैं। इन बच्चों में आप देख सकते हैं कि कैसे दो सगे भाइयों का स्वभाव और चरित्र पूरी तरह अलग हो सकता है! दीपक मेहनत के साथ पढ़ाई करने वाला, एक शांतचित्त लड़का है और परीक्षाओं में उसके अच्छे नंबर आते हैं। दूसरी तरफ कैलाश बिल्कुल विपरीत प्रकृति का लड़का है। वह पढ़ने की कोशिश तो बहुत करता है मगर पिछले साल फेल होते-होते बचा। वह अपनी कक्षा के और बड़ी कक्षाओं के बच्चों के साथ भी लड़ता-झगड़ता रहता है और शिक्षकों को उसे बार-बार चेतावनी देनी पड़ती है कि पढ़ाई के समय बात करना मना है। हो सकता है, यह किशोरावस्था के उन चंचल हार्मोन्स का असर हो या फिर दोनों भाइयों के स्वभाव में यह फर्क जन्मजात ही हो। लेकिन हम कोशिश करेंगे कि उसे भी हम आगे बेहतर ढंग से पढ़ा ले जाएँ और उसे शिक्षा का मजबूत आधार प्राप्त हो सके।

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