जब भी बारिश होती है, घर का हर सामान गीला हो जाता है – हमारे स्कूल के बच्चे – 28 अगस्त 2015

परोपकार

आज मैं आपका परिचय दो लड़कों से करवाना चाहता हूँ, जिन्होंने इसी साल से हमारे स्कूल आना शुरू किया है: लोकेश और कौशल, जो क्रमशः आठ और छह साल के हैं। गर्मियों में हम उनके घर गए थे और हालांकि हमारे सभी बच्चे गरीब ही हैं, ये बच्चे, जहाँ तक मेरी जानकारी है, निश्चित ही सबसे ज़्यादा गरीब परिवारों में से एक परिवार से आते हैं।

उनके इलाके में पहुँचकर हमें आसपास पूछताछ करनी पड़ी कि उनका घर कहाँ है क्योंकि उनका पिता फोन ही नहीं उठा रहा था। फिर हमें एक महिला मिली, जिसे समझ में आ गया कि हमें किससे मिलना है और उसने एक और महिला को पुकारा, जो कुछ गाय-भैसों को हाँकती हुई वहीं से निकल रही थी। हमें पता चला वही उन बच्चों की माँ है और हम उसके साथ उसके घर की ओर चल पड़े।

खैर, अगर आप उस टिन शेड से छाए हुए एक कमरे को 'घर' मान सकें, तो ही। आप उसे कुछ भी कह लें, वही लोकेश और कौशल का 'घर' है और उसकी बड़ी बहन, छोटे भाई और उन सबके माता-पिता का भी। वह उनका पुश्तैनी घर है, वह एक कमरा, जो उन्हें बारह साल पहले अपने पिता से मिला था और पिछले बारह साल में वे उसे सिर्फ तीन तरफ से ईंट और सीमेंट की दीवारों से, जिसमें से एक दीवार अभी भी अधूरी पड़ी हुई है, घेरकर कमरे का आकार भर दे सके हैं और ऊपर टिन की छत रख पाए हैं। और इन वर्षों में इस टिन की छत पर बहुत से बड़े-बड़े छेद भी हो चुके हैं, जहाँ से बरसात का पानी कमरे में आता रहता है, जिससे उनके पास जो भी थोड़ा-बहुत सामान है, भीगता रहता है।

स्वाभाविक ही, पिता की बेहद सीमित आमदनी के चलते वे इससे ज़्यादा कुछ नहीं करवा पाए। उनके पास एक खेत भी है किन्तु उसमें बड़ी मेहनत करनी पड़ती है और उसके बाद भी उसमें इतनी फसल नहीं होती कि घर के मासिक खर्च पूरे हो सकें। इसलिए खेती के अतिरिक्त उसे मजदूरी भी करनी पड़ती है, जिससे कम से कम उस बड़े परिवार के भोजन की व्यवस्था हो सके। उसकी पत्नी भरसक उसकी मदद करती है और पशुओं को चराने का काम उसी के जिम्मे है, जैसा कि यहाँ आते वक़्त हमने देखा था।

इन सब दिक्कतों के बाद, ऊपर से उनकी सबसे बड़ी बेटी को गंभीर जन्मजात शारीरिक समस्या है: उसके दो मूत्र-तंत्र, दो गर्भाशय हैं, परन्तु उसकी माँ के अनुसार पाखाने के लिए कोई रास्ता नहीं है। जहाँ तक हम समझ पाए, पाचन क्रिया संबंधी शरीर का एक बड़ा हिस्सा है ही नहीं। इसलिए उन्हें उस पर एक शल्यक्रिया करवानी पड़ी, जिसके ज़रिए डॉक्टरों ने हजम हो चुके भोजन की निकासी के लिए उसके पेट से सटाकर एक पाइप लगा दिया है। डॉक्टरों के अनुसार, सिर्फ इतना ही किया जा सकता था। होना यह चाहिए कि पेट से सटकर एक छोटी सी थैली हो, जिसे वह आवश्यकता होने पर खाली करके दूसरी थैली लगा ले मगर परिवार के पास इतने पैसे नहीं होते कि थैलियों का खर्च बर्दाश्त कर सकें। एक थैली की कीमत उनकी मासिक आमदनी का एक तिहाई हिस्सा होता है! इसके अलावा, थैली को वहाँ लगाना और निकालना बच्ची के लिए बहुत तकलीफदेह होता है। इसलिए वे उसके पेट को घेरता हुआ एक कपड़ा लपेटकर रख देते हैं, जिसे माँ नियमित रूप से बदलती रहती है।

आप सहज कल्पना कर सकते हैं कि इस परिवार के पास इतने आर्थिक संसाधन नहीं हैं कि वे अपने बच्चों को किसी महंगे निजी स्कूल में पढ़ने भेजें। बल्कि किसी सस्ते स्कूल में भेजना भी संभव नहीं है! इसलिए यह उनके लिए बहुत बड़ी राहत की बात है कि लोकेश और कौशल हमारे स्कूल में पूरी तरह मुफ़्त शिक्षा ग्रहण कर पा रहे हैं!

लोकेश और कौशल जैसे बच्चों की आप भी मदद कर सकते हैं। किसी एक बच्चे को या बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करके!

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