दोबारा डॉक्टर के पास जाने के लिए छह साल से इंतज़ार कर रहे हैं – हमारे स्कूल के बच्चे – 12 जून 2015

परोपकार

आज मैं आपका परिचय दो बच्चों से करवाना चाहता हूँ, जो बहुत जल्द हमारे स्कूल में पढ़ने लगेंगे। उनके नाम हैं, नरेश और ललिता और वे क्रमशः सात और पाँच साल उम्र के हैं। वृंदावन के गरीब इलाके में रहने वाले एक परिवार के तीन बच्चों में से ये दो सबसे छोटे बच्चे हैं।

बच्चों का पिता राजगीर है। काम की खोज में रोज़ वह एड़ी चोटी का ज़ोर लगाता है, किसी निर्माण स्थल पर सिर्फ एक दिन के काम के लिए नहीं बल्कि किसी निर्माण परियोजना के ठेकेदार के पास, जिसका काम दस, बीस या और ज़्यादा समय तक चलता हो। वैसे वह रोज़ मजदूरी पा सकता है मगर किसी ठेकेदार के पास काम करने से यह सुनिश्चित हो जाता है कि दस या बीस दिन लगातार काम करने की एकमुश्त मजदूरी उसे मिलेगी। अन्यथा, उसे रोज़ समय पर लेबर मार्केट निकलना पड़ता है, किसी ठेकेदार को काम के लिए ढूँढ़ना पड़ता है और हाड़तोड़ काम करना पड़ता है, जिससे ठेकेदार को विश्वास हो जाए कि वह बहुत मेहनती है और कल फिर उसे अपने यहाँ काम दे दे।

इस तरह हर माह वह लगभग 7000 रुपए यानी 120 डॉलर कमा लेता है। उन दिनों में, जब उसे काम नहीं मिल पाता, वह अपने माता-पिता के खेत पर उनकी मदद करने चला जाता है, जहाँ वह खेत सींचने का या फसल कटाई आदि का कोई भी काम कर लेता है। यह परिवार का साझा खेत है और परिवार के सभी सदस्य वहाँ काम करते हैं: उसका पिता, उसका भाई और वह खुद। गेहूँ पक जाने के बाद फसल के तीन हिस्से किए जाते हैं और स्वाभाविक ही कभी भी इतना गेहूँ नहीं बच पाता कि उसे बेचकर कुछ नगदी हाथ लग सके-लेकिन गनीमत है कि घर में साल भर खाने के लिए पर्याप्त हो जाता है। उनके पास एक गाय भी है, जो बच्चों के पीने के लिए पर्याप्त दूध देती है और थोड़ा-बहुत खाने-पीने के दूसरे कामों भी खर्च हो जाता है। गाय का गोबर भी कम बड़ी नेमत नहीं है, जिसका उपयोग कंडे बनाने में होता है, जो बाद में खाना पकाने के काम आते हैं।

नरेश का बड़ा भाई दस साल का है और एक सस्ते निजी स्कूल में पढ़ता है। नरेश भी पहले उसी स्कूल में लिखना-पढ़ना सीखता था लेकिन जब उसके परिवार ने हमारे स्कूल के बारे में सुना तो अपने दोनों छोटे बच्चों के प्रवेश के लिए कोशिश की और सफल हो गए। हमारे स्कूल में दाखिला हो जाने के बाद अब उनकी पढ़ाई मुफ्त होगी और इस तरह उनकी शिक्षा पूरी तरह निरापद हो गई है: क्योंकि अगर उनका पिता लंबे समय के लिए काम नहीं पाता तो वे भले ही भूखे न रहते मगर निजी स्कूल में तीन बच्चों की फीस अदा करना उनके लिए मुश्किल होता!

दोनों बच्चे बड़े हँसमुख हैं और अब इंतज़ार कर रहे हैं कि कब स्कूल खुलें और वे स्कूल की ओर दौड़ लगा दें। पहले एक बार बातचीत के दौरान हमने नोटिस किया था कि ललिता की आँखें तिरछी हैं, इधर-उधर डोलती हैं। किसी चीज़ पर वह कभी एक आँख को एकाग्र करने की कोशिश करती है तो कभी दोनों आँखों को और कभी दूसरी आँख को। माँ ने बताया कि जब वह दो माह की थी तब अपनी आँखों को नोच लिया था और डॉक्टरों ने उनसे छह-सात साल इंतज़ार करने को कहा, जिसके बाद वे बताने वाले थे कि वह दोनों आँखों से देख पाएगी या नहीं। हमने पूछा कि अब उन्हें इस बारे में पता है या नहीं क्योंकि अब तो बच्ची पर्याप्त बड़ी हो चुकी है। माँ ने इंकार में सिर हिलाया और कहा कि उसने कभी बताया ही नहीं। यह सब सुनकर हमने उससे कहा कि उसे चाहिए कि किसी अच्छे आँख के डॉक्टर के पास बच्ची को ले जाए, जिससे उसकी जाँच हो सके और पता चल सके कि उसकी आँखों के लिए कुछ किया जा सकता है या नहीं और स्वाभाविक ही हमने उसे आश्वस्त भी किया कि कोई समस्या आने पर हम मदद करेंगे, जिससे वे उसके समुचित इलाज का खर्च बर्दाश्त कर सकें।

अगर आप नरेश और ललिता जैसे बच्चों की कोई मदद करना चाहते हैं तो हम बड़े शुक्रगुजार होंगे। एक बच्चे को या बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करें। कोई राशि अंशदान के रूप में भी आप हमें प्रेषित कर सकते हैं!

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