अनियमित रोजगार और बहुत सारे खाने वाले – हमारे स्कूल के बच्चे- 6 दिसंबर 2013

परोपकार

आज मैं आपको अपने स्कूल की एक और लड़की, निशा से मिलवाना चाहता हूँ, जिसकी उम्र तेरह साल है। बाहर से आकर वृन्दावन में बसे बहुत से ग़रीब परिवार शहर के बाहरी हिस्से में रहते हैं लेकिन उनके विपरीत निशा शहर के बीचोंबीच, पुराने वृन्दावन में रहती है। उसके परिवार वाले वृन्दावन के पुराने बाशिंदे हैं और जिस मकान में वे लोग रह रहे हैं वह निशा के दादा ने बहुत पहले खरीदा था।

निचली मंज़िल पर एक बेडरूम और एक सामने वाली छोटी सी बैठक है और पहली मंज़िल पर एक कमरा है। निशा, उसके तीन भाई-बहन और माता-पिता नीचे वाले हिस्से में रहते हैं जब कि पहली मंज़िल पर एक कमरे में उसके चाचा-चाची और उनके बच्चे रहते हैं।

इतने सालों से साथ-साथ रहने और अधिकांश समय घर के बाहर व्यतीत करने के कारण जगह की कमी उनके लिए समस्या नहीं है। समस्या है धन की कमी, नियमित रोजगार प्राप्त न होना। निशा के पिता ने मार्बल, ग्रेनाइट और ऐसे ही दूसरे कीमती पत्थरों की कटाई का काम सीखा हुआ है, जिनका फर्श बिछाने, दीवारों की सजावट और कई दूसरे कामों में उपयोग होता है। लेकिन दुर्भाग्य से, पिछले एक साल से उसे कोई नियमित काम उपलब्ध नहीं हुआ है।

वृन्दावन में निर्माण कार्य तो बहुत सारे चल रहे हैं लेकिन निशा के परिवार वाले बताते हैं कि वृन्दावन के बाशिंदों के लिए उचित मजदूरी पर काम बहुत कम उपलब्ध है-बात यह है कि बड़ी संख्या में मजदूर बाहर से आते जा रहे हैं, जो बहुत कम रोजंदारी पर काम करने के लिए तैयार हो जाते हैं! निशा के पिता को छह लोगों का पेट भरना है और वह उस मजदूरी पर काम नहीं कर सकता, जिसके लिए एक युवा एकाकी मजदूर आसानी के साथ तैयार हो जाता है। इसलिए आजकल वह सिर्फ वृन्दावन में ही नहीं, दिल्ली, आगरा जैसे दूसरे शहरों में भी काम तलाश करने की कोशिश करता है। उसे दूसरे बड़े शहरों की निर्माण साइटों में कुछ दिनों के लिए काम मिल भी जाता है। पिछले माह दस दिन के लिए मजदूरी करने वह दिल्ली गया था।

कुछ इस अतिरिक्त रोजगार की बदौलत और कुछ स्थानीय साहूकारों से ऋण लेकर वह अपना काम चलाने की कोशिश करता है मगर कर्ज़ ली हुई रकम वापस भी करनी पड़ती है। तो हफ्तों बेरोजगार रहने के नतीजे में उस पर कर्ज़ का बोझ क्रमशः भारी होता जा रहा है!

परिवार की खराब आर्थिक स्थिति से अवगत होने के कारण निशा तेरह वर्ष की मासूम उम्र में ही बड़ी और प्रौढ़ लगती है। स्कूल के गलियारों में अपनी सहेलियों के साथ चहलकदमी करते हुए वह एक युवा महिला जैसी नज़र आती है लेकिन फिर अचानक आप उसकी खिलखिलाहट सुनते हैं और सोचते हैं कि परिवार कितना भी गरीब हो, बच्चे बच्चे ही होते हैं!

पहले निशा एक हिन्दी मीडियम स्कूल में पढ़ा करती थी इसलिए हमारे स्कूल में प्रवेश लेने के बाद इस साल शुरुआत में उसे अंग्रेज़ी पाठ समझने में दिक्कत होती थी। लेकिन कठिन प्रयास करके वह बहुत जल्द दूसरे बच्चों के समकक्ष आ गई है। शिक्षक भी उसकी लगन, मेहनत और उसके गंभीर स्वभाव की प्रशंसा करते हैं।

इसका अर्थ यह नहीं है कि मौज-मस्ती के साथ उसका कोई वास्ता ही नहीं है! खेल के समय आप उसे कक्षा के दूसरे बच्चों के साथ खूब उछल-कूद करते और हँसते-खिलखिलाते देख सकते हैं। उसके इन मित्रों में एक है उसकी चचेरी बहन अंजलि, जिसके बारे में मैं अगले सप्ताह आपको बताऊंगा।

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