आज मैं आपका परिचय एक लड़के और उसके परिवार के साथ करवाना चाहता हूँ। उसका नाम घनश्याम है। वह छह साल का है और परिवार के तीन बच्चों में सबसे बड़ा है।
घनश्याम का पिता मजदूर है और उसे रोज़ किसी न किसी ठेकेदार के पास काम ढूँढ़ने उनके निर्माण स्थलों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। कभी-कभी दूकानों से निर्माण-स्थलों तक सामान ढोने का काम ही मिल पाता है तो वही करना पड़ता है। लेकिन फिर भी काम उसे रोज़ नहीं मिल पाता और इसलिए उसके परिवार को पता ही नहीं है कि कुल मिलाकर हर माह वह कितना कमा लेता है।
लेकिन खाने वाले मुँह कम नहीं हैं! परिवार के सिर्फ दो सदस्य, घनश्याम का पिता और उसका दादा, रोज़ पैसे कमाकर लाते हैं। घनश्याम की दादी के सात बच्चे थे: दो लड़के और पाँच लड़कियाँ। लड़कियों में तीन की शादियाँ हो चुकी हैं इसलिए उनके साथ नहीं रहतीं मगर बाकी की दो बहनें अभी उनके साथ ही रहती हैं। उनका एक लड़का एक दुर्घटना में कालकलवित हो गया और उसकी पत्नी भी एक बीमारी का शिकार हो गई। उनके दो बच्चे भी उन्हीं के साथ रहते हैं। और फिर घनश्याम के माता-पिता और उनके तीन बच्चे तो हैं ही। सभी को खाने के लिए भोजन चाहिए, कपड़े लत्ते और अन्य आवश्यक वस्तुएँ चाहिए और इसके अलावा, परिवार में दवा-दारू और तीज-त्योहार के दूसरे खर्चे तो लगे ही रहते हैं।
इसीलिए परिवार हमारे पास आया और अपने सबसे बड़े बच्चे को हमारे स्कूल में दाखिल करा दिया। घनश्याम पहले एक निजी स्कूल में पढ़ता था लेकिन उसकी पढ़ाई का नियमित खर्च उन पर बहुत बड़ा बोझ बन गया था। आखिर जब उन्हें हमारे स्कूल के बारे में पता चला तो उन्होंने सोचा, एक बार चलकर किस्मत आजमाई जाए और उसे हमारे यहाँ दाखिला मिल गया!
आप कल्पना कर सकते हैं कि वे किस तरह सुकून से भर गए होंगे कि अब घनश्याम हमारे स्कूल में पूरी तरह मुफ्त पढ़ाई कर सकता है। और घनश्याम भी बहुत खुश है-वह मन लगाकर पढ़ाई करता है, बहुत से दोस्त बना लिए हैं। है भी वह बहुत प्यारा, खुशमिजाज़ लड़का!
घनश्याम जैसे बच्चों की आप भी मदद कर सकते हैं! किसी एक बच्चे को या बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करके!
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