गरीबी के कारण नौ साल की उम्र में स्कूल की पढ़ाई शुरू करी: हमारे स्कूल के बच्चे! 17 जनवरी 2014

आज मैं अपने स्कूल के एक विद्यार्थी, सुजीत से आपका परिचय करवाऊंगा। वह बारह साल का है और इस तरह अपनी कक्षा का यानी कि पहली क्लास का सबसे बड़ा विद्यार्थी है। उसके दो भाई हैं; एक उससे बड़ा, 15 साल का और दूसरा उससे छोटा, सिर्फ तीन साल का।

कृष्ण और शंकर जिस आवासीय संकुल में रहते हैं, वहीं सुजीत भी रहता है। उसकी माँ और पिता दोनों रोज़ दिन भर के लिए काम पर चले जाते हैं। उसकी माँ बताती है, यह जगह बच्चों के लिए बहुत बढ़िया है क्योंकि उसके और उसके पति की अनुपस्थिति में सुजीत या उसका बड़ा भाई घर आ जाएँ तो उन्हें खेलने के लिए सुरक्षित जगह उपलब्ध हो जाती है, अर्थात, सड़क पर खेलने की मजबूरी नहीं होती।

उसका पिता रिक्शा चलाता है लेकिन जब हमने उसकी पत्नी से बात की तो उसने बताया कि वह बड़ी मुश्किल से कुछ कमा पाता है। उसने कहा कि वह ऐसा हतभाग्य है कि उसे ग्राहक ही नहीं मिलते-भाग्य खराब है या वह कामचोर है, हम नहीं जान सकते। लेकिन उसकी पत्नी बताती है कि जब पैसे की तंगी बेहद बढ़ जाती है तो वह एक या दो माह के लिए सुरक्षा गार्ड का काम पकड़ लेता है।

सुजीत की माँ भी एक स्कूल में वहाँ के बच्चों के लिए खाना पकाने का काम करती है। वह एक महंगा निजी स्कूल है और वहाँ काम मिलना सौभाग्य की बात ही है, क्योंकि उसके सबसे बड़े लड़के को वहाँ मुफ्त शिक्षा मिल रही है। उसका वेतन, जो लगभग 30 यू एस डालर यानी लगभग 2000 रुपए मासिक है, 20 डालर यानी लगभग 1300 रुपए मकान किराया, भोजन और कपड़े-लत्तों का खर्च और ऊपर से दूसरे लड़के की पढ़ाई का खर्च वहन करने के लिए अपर्याप्त है।

यही कारण रहा कि नौ साल का हो जाने के बावजूद सुजीत स्कूल नहीं जा पाया था। तभी उसकी माँ को हमारे चैरिटी स्कूल के बारे में पता चला और वह अपने छोटे बेटे की पढ़ाई के संबंध में बात करने हमसे मिलने आई। स्वाभाविक ही हमने उसे अपने स्कूल में दाखिल कर लिया और इस तरह सुजीत अब हमारे स्कूल में पढ़ रहा है। उम्र में बड़ा होने की वजह से वह तेज़ी के साथ पढ़ाई में आगे बढ़ रहा है और लोअर के जी में बहुत कम समय में उसने पढ़ना, लिखना और प्राथमिक गणित, जैसे जोड़ना-घटाना आदि सीख लिया है।

शिक्षक बताते हैं कि वह बहुत खुशमिजाज बालक है और अपनी उम्र के दूसरे बच्चों के साथ खेलना पसंद करता है। वे उस पर कई जिम्मेदारियाँ भी सौंप देते हैं जैसे: जब उन्हें किसी काम से कहीं जाना होता है तो वे कक्षा के छोटे बच्चों को थोड़े समय के लिए उसकी ज़िम्मेदारी पर छोड़ जाते हैं और वह पूरी तन्मयता के साथ उनकी देखभाल करता है।

आत्मिक खुशी और मुस्कुराहट के साथ वह बताता है कि उसे हमारा स्कूल कितना प्रिय है-लेकिन शायद घर पर पड़ोसी बच्चों के साथ क्रिकेट खेलने से ज़्यादा नहीं!

अगर आप सुजीत जैसे बच्चों की मदद करना चाहते हैं तो आप किसी एक बच्चे को प्रायोजित करके या बच्चों के एक दिन के भोजन का खर्च वहन करके ऐसा कर सकते हैं!

Related posts

रोशनी और कृष्णकांत

सिर्फ रहने के स्थान के बदले में दिन भर मजदूरी करना – हमारे स्कूल के बच्चे – 22 जनवरी 2016

स्वामी बालेंदु अपने पाठकों का परिचय अपने स्कूल के दो बच्चों से करवा रहे हैं। उनकी माँ एक विशाल घर ...
मोनिका

मोनिका अपनी अंतिम बड़ी शल्यक्रिया के लिए तैयार है – 19 जनवरी 2016

स्वामी बालेंदु निकट भविष्य में होने वाली मोनिका की तीसरी शल्यक्रिया के बारे में लिख रहे हैं। मोनिका उनके स्कूल ...
Mohini with her father

जब एक नाई लड़का पैदा करने के चक्कर में पाँच-पाँच बच्चे पैदा कर देता है – हमारे स्कूल के बच्चे – 15 जनवरी 2016

स्वामी बालेंदु एक नाई की बेटी, मोहिनी का परिचय अपने पाठकों से करवा रहे हैं, जो उनके चैरिटी स्कूल में ...
हर साल घर में पानी घुस जाता है

हर साल घर में पानी घुस जाता है – हमारे स्कूल के बच्चे – 18 दिसंबर 2015

स्वामी बालेंदु अपने स्कूल के दो सबसे गरीब परिवार से आने वाले बच्चों का परिचय करवा रहे हैं। हर साल ...
नाई, जिसके पास स्कूल की फीस भरने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं हैं

नाई, जिसके पास स्कूल की फीस भरने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं हैं – हमारे स्कूल के बच्चे – 11 दिसंबर-2015

स्वामी बालेंदु अपने स्कूल के दो बच्चों का परिचय अपने पाठकों से करवा रहे हैं। उनका पिता नाई है और ...
टायर मरम्मत के काम से इतनी कमाई नहीं होती कि स्कूल की फीस भरी जा सके - हमारे स्कूल के बच्चे - 4 दिसंबर 2015

टायर मरम्मत के काम से इतनी कमाई नहीं होती कि स्कूल की फीस भरी जा सके – हमारे स्कूल के बच्चे – 4 दिसंबर 2015

स्वामी बालेंदु अपने चैरिटी स्कूल की दो लड़कियों का परिचय अपने पाठकों से करवा रहे हैं, जिनके नाम सुनीता और ...
सिर्फ आधा माह काम करके परिवार का भरण-पोषण करना मुश्किल होता है - हमारे स्कूल के बच्चे - 27 नवंबर 2015

सिर्फ आधा माह काम करके परिवार का भरण-पोषण करना मुश्किल होता है – हमारे स्कूल के बच्चे – 27 नवंबर 2015

स्वामी बालेंदु अपने स्कूल की एक लड़की का परिचय अपने पाठकों से करवाते हुए उसके परिवार की व्यथा-कथा लिख रहे ...
जब पिता बनने की ज़िम्मेदारी सिर पर पड़ी तभी पैसे कमाना शुरू किया - हमारे स्कूल के बच्चे - 20 नवंबर 2015

जब पिता बनने की ज़िम्मेदारी सिर पर पड़ी तभी पैसे कमाना शुरू किया – हमारे स्कूल के बच्चे – 20 नवंबर 2015

स्वामी बालेंदु अपने पाठकों से अपने स्कूल के एक लड़के का परिचय करवा रहे हैं, जिसका परिवार बिना बिजली के ...
चाय बेचकर स्कूल का खर्च नहीं उठाया जाता - हमारे स्कूल के बच्चे - 13 नवंबर 2015

चाय बेचकर स्कूल का खर्च नहीं उठाया जाता – हमारे स्कूल के बच्चे – 13 नवंबर 2015

स्वामी बालेंदु पाठकों से अपने स्कूल के तीन बच्चों का परिचय करवा रहे हैं। उनका पिता एक चाय की गुमटी ...
अपने बच्चों के घर दोबारा जाने पर हमें सकारात्मक विकास दिखाई देता है - हमारे स्कूल के बच्चे - 6 नवंबर 2015

अपने बच्चों के घर दोबारा जाने पर हमें सकारात्मक विकास दिखाई देता है – हमारे स्कूल के बच्चे – 6 नवंबर 2015

स्वामी बालेंदु अपने स्कूल के एक बच्चे का परिचय करवा रहे हैं, जिसके सहोदर भाई-बहनों के बारे में वे पहले ...

Leave a Reply