14 साल की उम्र में और अपने दो छोटे सहोदरों के बाद स्कूली पढ़ाई की शुरुआत – हमारे स्कूल के बच्चे – 1 अगस्त 2014

आज फिर समय है अपने स्कूल के बच्चों से आपका परिचय करवाने का और आज मैं एक नहीं बल्कि तीन-तीन बच्चों से आपका परिचय करवाऊँगा, जिनमें से दो हमारे स्कूल में पिछले दो सालों से पढ़ रहे हैं जबकि एक बिल्कुल नई है-लेकिन यह कोई सामान्य जानकारी नहीं है, नई लड़की उम्र में उन तीनों सहोदरों में सबसे बड़ी है!

पूनम बारह साल की है और अब हमारे स्कूल की दूसरी कक्षा में पढ़ती है। उसका छोटा भाई, निखिल नौ साल का है और पिछले वर्ष यूकेजी पढ़कर, जो मुख्य स्कूली शिक्षा से पहले की दूसरी कक्षा है, इस साल से पहली कक्षा में पढ़ रहा है। उनका एक और छोटा भाई है लेकिन अभी वह स्कूल जाने के लिहाज से बहुत छोटा है। लेकिन देखने वाली बात यह है कि उनकी सबसे बड़ी बहन, पुष्पा, जो चौदह साल की हो चुकी है, इस साल से पहली बार स्कूल पढ़ने आ रही है। वह इस समय लोअर के जी में है, जिसे उसका छोटा भाई पहले ही पास कर चुका है!

यह कैसे हुआ कि यह लड़की इतने साल स्कूल नहीं जा पाई? बच्चों का पिता बताता है कि पहले उसने पुष्पा को वृन्दावन के एक स्कूल में दाखिल कराया था लेकिन फिर वह अपनी दादी के साथ रहने अपने गाँव चली गई, जहाँ के वे लोग रहने वाले हैं, और इसलिए उसका स्कूल छूट गया। बाद में उसने गाँव के ही एक स्कूल में उसका दाखिला तो करा दिया था लेकिन वहाँ वह स्कूल गई ही नहीं।

वह कहता है कि यह पुष्पा की गलती है। हम कहते हैं कि यह उसकी और उसकी पत्नी की गलती है। अगर अभिभावक चाहते हैं कि उनके बच्चे कुछ सीख सकें, लिख-पढ़कर बेहतर भविष्य की ओर अग्रसर हो सकें तो अभिभावकों की ही यह ज़िम्मेदारी बनती है कि अपने बच्चों को स्कूल भेजें! यह ऐसी बात है जिसे, दुर्भाग्य से, हमारे स्कूल के बच्चों के अभिभावक भी अच्छी तरह नहीं समझते!

लेकिन यह समझ में आने वाली बात है: वे खुद भी तो कभी स्कूल नहीं गए थे! यह चार बच्चों का पिता एक सुरक्षा गार्ड है और हर माह 80$ यानी लगभग 5000 ₹ कमाता है। 25$ यानी लगभग 1500₹ घर-किराया और चार बच्चों के सामान्य खर्चों की पूर्ति करने के बाद उसे खुशी है कि उसकी पत्नी भी कोई काम-धंधा करती है। पत्नी मजदूर है और उसे रोज़ कोई न कोई काम ढूंढ़ना पड़ता है। वे नहीं जानते कि माह भर में वह कितना कमाती है लेकिन उसकी कमाई से ही घर के खर्च सुचारू रूप से पूरे हो पा रहे हैं।

लेकिन दोनों की मिलाकर होने वाली कमाई भी बेहतर जीवन के लिए पर्याप्त नहीं है! वे एक मकान के एक कमरे में रहते हैं, जिसके दो और कमरों में उनके जैसे ही दो दूसरे परिवार रहते हैं। वे सब कुल मिलाकर 15 लोग हैं, जो एक ही नहानीघर, एक छत और आँगन के रूप में छोटी सी खुली जगह का साझा इस्तेमाल करते हैं, जहाँ वे सब कतार में अपने कपड़े सुखाते हैं।

अगर ये बच्चे अच्छी, ठोस शिक्षा प्राप्त कर लेते हैं, पढ़ना-लिखना सीख लेते हैं और इस तरह अपने लिए बेहतर काम-धंधे की व्यवस्था का जुगाड़ करके बेहतर आय का साधन जुटा लेते हैं, बचत कर पाते हैं तो ही अगली पीढ़ी तक उनकी आर्थिक दशा में परिवर्तन की संभावना बन सकती है। इस संभावना की जड़ में हमारा स्कूल है-और बच्चों को दूसरे किसी स्कूल में पढ़ाने की उनकी हैसियत नहीं है!

हमें खुशी है कि इतनी बड़ी उम्र में ही सही, पुष्पा ने पढ़ने का निर्णय लिया और हम आशा करते हैं कि इस बार वह अपना पढ़ना-लिखना जारी रखेगी!

अगर आप चाहते हैं कि पुष्पा, पूनम और निखिल जैसे और भी दूसरे बच्चों की सहायता कर सकें तो किसी भी एक बच्चे को प्रायोजित करके या हमारे स्कूल के बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करके ऐसा कर सकते हैं!

Related posts

रोशनी और कृष्णकांत

सिर्फ रहने के स्थान के बदले में दिन भर मजदूरी करना – हमारे स्कूल के बच्चे – 22 जनवरी 2016

स्वामी बालेंदु अपने पाठकों का परिचय अपने स्कूल के दो बच्चों से करवा रहे हैं। उनकी माँ एक विशाल घर ...
मोनिका

मोनिका अपनी अंतिम बड़ी शल्यक्रिया के लिए तैयार है – 19 जनवरी 2016

स्वामी बालेंदु निकट भविष्य में होने वाली मोनिका की तीसरी शल्यक्रिया के बारे में लिख रहे हैं। मोनिका उनके स्कूल ...
Mohini with her father

जब एक नाई लड़का पैदा करने के चक्कर में पाँच-पाँच बच्चे पैदा कर देता है – हमारे स्कूल के बच्चे – 15 जनवरी 2016

स्वामी बालेंदु एक नाई की बेटी, मोहिनी का परिचय अपने पाठकों से करवा रहे हैं, जो उनके चैरिटी स्कूल में ...
हर साल घर में पानी घुस जाता है

हर साल घर में पानी घुस जाता है – हमारे स्कूल के बच्चे – 18 दिसंबर 2015

स्वामी बालेंदु अपने स्कूल के दो सबसे गरीब परिवार से आने वाले बच्चों का परिचय करवा रहे हैं। हर साल ...
नाई, जिसके पास स्कूल की फीस भरने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं हैं

नाई, जिसके पास स्कूल की फीस भरने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं हैं – हमारे स्कूल के बच्चे – 11 दिसंबर-2015

स्वामी बालेंदु अपने स्कूल के दो बच्चों का परिचय अपने पाठकों से करवा रहे हैं। उनका पिता नाई है और ...
टायर मरम्मत के काम से इतनी कमाई नहीं होती कि स्कूल की फीस भरी जा सके - हमारे स्कूल के बच्चे - 4 दिसंबर 2015

टायर मरम्मत के काम से इतनी कमाई नहीं होती कि स्कूल की फीस भरी जा सके – हमारे स्कूल के बच्चे – 4 दिसंबर 2015

स्वामी बालेंदु अपने चैरिटी स्कूल की दो लड़कियों का परिचय अपने पाठकों से करवा रहे हैं, जिनके नाम सुनीता और ...
सिर्फ आधा माह काम करके परिवार का भरण-पोषण करना मुश्किल होता है - हमारे स्कूल के बच्चे - 27 नवंबर 2015

सिर्फ आधा माह काम करके परिवार का भरण-पोषण करना मुश्किल होता है – हमारे स्कूल के बच्चे – 27 नवंबर 2015

स्वामी बालेंदु अपने स्कूल की एक लड़की का परिचय अपने पाठकों से करवाते हुए उसके परिवार की व्यथा-कथा लिख रहे ...
जब पिता बनने की ज़िम्मेदारी सिर पर पड़ी तभी पैसे कमाना शुरू किया - हमारे स्कूल के बच्चे - 20 नवंबर 2015

जब पिता बनने की ज़िम्मेदारी सिर पर पड़ी तभी पैसे कमाना शुरू किया – हमारे स्कूल के बच्चे – 20 नवंबर 2015

स्वामी बालेंदु अपने पाठकों से अपने स्कूल के एक लड़के का परिचय करवा रहे हैं, जिसका परिवार बिना बिजली के ...
चाय बेचकर स्कूल का खर्च नहीं उठाया जाता - हमारे स्कूल के बच्चे - 13 नवंबर 2015

चाय बेचकर स्कूल का खर्च नहीं उठाया जाता – हमारे स्कूल के बच्चे – 13 नवंबर 2015

स्वामी बालेंदु पाठकों से अपने स्कूल के तीन बच्चों का परिचय करवा रहे हैं। उनका पिता एक चाय की गुमटी ...
अपने बच्चों के घर दोबारा जाने पर हमें सकारात्मक विकास दिखाई देता है - हमारे स्कूल के बच्चे - 6 नवंबर 2015

अपने बच्चों के घर दोबारा जाने पर हमें सकारात्मक विकास दिखाई देता है – हमारे स्कूल के बच्चे – 6 नवंबर 2015

स्वामी बालेंदु अपने स्कूल के एक बच्चे का परिचय करवा रहे हैं, जिसके सहोदर भाई-बहनों के बारे में वे पहले ...

Leave a Reply