पिता कभी रसोइया तो कभी मजदूर हो जाता है – हमारे स्कूल के बच्चे – 16 जनवरी 2015

परोपकार

आजकल हमारे स्कूल के बच्चे बड़े सौभाग्यशाली महसूस कर रहे हैं-भीषण ठंड के कारण चार हफ्ते से उनके स्कूल की छुट्टियाँ चल रही हैं! फिर भी मैं आपको अपने स्कूल के बच्चों से मिलवाने का काम जारी रखूँगा! आज आप राधा और गोपाल से मिलेंगे, जो, दोनों ही, हमारे स्कूल में पिछले चार वर्षों से पढ़ रहे हैं।

राधा के माता-पिता खुद कभी स्कूल नहीं गए लिहाजा दोनों ही अपढ़ हैं। पिता मध्यभारत स्थित अपने जन्मस्थान से, जो एक छोटा सा गाँव है, 25 साल पहले वृन्दावन आया था। वह काम की तलाश में था क्योंकि उसके अभिभावकों के खेत में इतना उत्पादन नहीं होता था कि वे उसे, उसके तीन भाइयों और भविष्य में, उनके विवाह के बाद, उनके परिवारों का लालन-पालन ठीक तरह से कर पाते! उसने एक रसोई में सहायक के रूप में काम शुरू किया और धीरे-धीरे खाना पकाना सीख लिया और इस तरह वह अब एक निपुण रसोइया बन चुका है-अर्थात जब कभी रसोइये का काम उपलब्ध हो जाता है, तब!

यानी रसोइये के रूप में उसकी कोई पक्की नौकरी नहीं है बल्कि जब कहीं विवाह या बड़ी जन्मदिन की पार्टी आदि जैसा कोई समारोह होता है तो ऐसे आयोजन करने वाली कंपनियाँ या बड़े ठेके लेने वाले रसोइये उसे बुला लेते हैं क्योंकि बहुत सारे व्यंजन तैयार करने के लिए कई रसोइयों की ज़रूरत पड़ती है। इसलिए वृन्दावन की बहुत सी ऐसी कंपनियों के पास और कुछ बड़े ठेके लेने वाले रसोइयों के पास उसका फोन नंबर है और जब ज़रूरत होती है, वे उसे बुला लेते हैं। अर्थात, कुछ महीनों में, जब बहुत से पर्व और समारोह आयोजित होते हैं, उसे काफी काम मिल जाता है। लेकिन दूसरे महीनों में वह घर में बैठे-बैठे किसी फोन का इंतज़ार करता रहता है। जब कोई फोन आता है तो वह अपने 16 वर्षीय बेटे को भी वहाँ ले जाता है कि वह भी खाना पकाना सीख ले।

छह लोगों का यह परिवार एक बड़े से मकान में एक कमरा किराए पर लेकर रहता है। इस मकान में तीन कमरे, एक आँगन और गाय-भैंस बांधने के लिए थोड़ी सी जगह है। मकान मालिक इन तीनों कमरों में रहने वाले परिवारों से उनके कमरे का 1000 रुपया अर्थात लगभग 15 डॉलर किराया लेता है। इसके अलावा उन्हें उसकी गायों की देखभाल भी करनी पड़ती है।

जब राधा और गोपाल के पिता के लिए मकान का किराया अदा करना मुश्किल हो जाता है तो वह कई तरह के दूसरे काम भी करने के लिए मजबूर हो जाता है। अक्सर वह बैलगाड़ी चलाने लगता है और निर्माण स्थलों पर रेत और ईंटें लादकर ले जाने का काम करता है। यहाँ पर भी उसका सबसे बड़ा लड़का उसके साथ होता है और कुछ न कुछ कमाने की फिराक में रहता है और अक्सर कमा ही लेता है।

जबकि उसके बड़े भाई ने 14 साल की उम्र में पढ़ना-लिखना छोड़ दिया था, 13 वर्षीय गोपाल के कुछ अलग ही इरादे हैं: वह अधिक से अधिक पढ़ना चाहता है। फिलहाल वह हमारे स्कूल की चौथी कक्षा में है। राधा, जो 11 साल की है, अभी दूसरी में है। उनका 8 साल का एक और भाई है। पिछले साल वे उसे हमारे स्कूल में भर्ती कराना चाहते थे लेकिन दुर्भाग्य से वे देर से आए और तब तक हमारी सबसे निचली कक्षा पूरी तरह भर चुकी थी! हमने उन्हें अगले साल समय पर आने के लिए कहा है, जिससे वह भी हमारे स्कूल में पढ़ाई कर सके!

उनके घर से निकलते हुए अचानक हमारी नज़र छोटे भाई के दाँतों पर पड़ी जो बहुत पीले और खराब हो रहे थे। हमने उससे पूछा कि वह रोज़ ब्रश करता है या नहीं तो उसने बताया कि रोज़ एक बार करता हूँ। हम बता ही रहे थे कि कम दो बार अवश्य करना चाहिए कि राधा बीच में ही बोल पड़ी: यह तंबाकू खाता है इसलिए इसके दाँत खराब हो गए हैं! हम दंग रह गए कि इतना छोटा लड़का और अभी से तंबाकू की लत! स्वाभाविक ही हम थोड़ा नाराज़ हुए और उनके माता-पिता से कहा कि अपने बच्चे की तरफ ध्यान दीजिए और उसे यह जहर खाने से तुरंत रोकिए!

राधा और गोपाल दोनों ही स्कूल में अच्छी पढ़ाई कर रहे है। वे शांत विद्यार्थी हैं और एकाग्र होकर अपनी पढ़ाई में मग्न रहते हैं और दूसरे क्या कर रहे हैं इससे उन्हें कोई मतलब नहीं होता। वे अपना गृह कार्य समय पर और बहुत अच्छी तरह करके लाते हैं और हालांकि शिक्षक उनकी पढ़ाई से बहुत संतुष्ट और खुश हैं, वे उन्हें ज़्यादा से ज़्यादा मिलनसार होने के लिए भी प्रेरित करते हैं।

और यह सब सिर्फ इसलिए संभव हो पा रहा है क्योंकि वे हमारे स्कूल में मुफ्त शिक्षा पा रहे हैं। अन्यथा उनका पिता स्कूल फीस अदा करने और किताब-कापियाँ और वर्दियाँ खरीदने के लिए पैसे कहाँ से लाता?

राधा और गोपाल जैसे बच्चों की आप भी मदद कर सकते हैं! किसी एक बच्चे को या स्कूल के बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करके!

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