अस्पताल के बिस्तर पर सोने की मजबूरी – हमारे स्कूल के बच्चे – 14 अगस्त 2015

परोपकार

आज मैं आपका परिचय अपने स्कूल की एक लड़की, अनुष्का से करवाना चाहता हूँ, जो अभी आठ साल की है और हमारे स्कूल के लिए नई है। जब उसने हमारे स्कूल में भर्ती होने का आवेदन किया तो हम उसके घर का दौरा करना चाहते थे किन्तु उसका परिवार हमें उनके दिए आश्रम वाले पते पर नहीं मिला। आश्रम के लोग जानते तक नहीं थे कि वे कहाँ चले गए इसलिए हम अनुष्का के घर अभी दस दिन पहले ही जा पाए, जब हमने उसका घर देखने का बहुत ज़ोर डाला कि बताओ तुम लोग कहाँ रहते हो।

हमने एक बहुत बड़े घर में प्रवेश किया लेकिन सामने से नहीं बल्कि पिछले दरवाजे से। अनुष्का सीधे सीढ़ियों की ओर बढ़ गई, जो नीचे तलघर कि ओर निकलती थीं। उसका दादा हमसे मिलने बाहर आया और आधी सीढ़ियाँ उतरने पर हमें एक हल्की-फुल्की खाट दिखाई दी, एक तरफ रस्सी पर कपड़े सूख रहे थे तथा आसपास कुछ रोज़मर्रा के इस्तेमाल का सामान रखा हुआ था। इन सबके बीच एक अधेड़ महिला एक नन्ही बच्ची को कपड़े पहना रही थी। पता चला वह अनुष्का की डेढ़ साल की छोटी बहन राधिका है और अधेड़ महिला उसकी दादी।

यह लड़की और उनका पिता लगभग एक साल से ही वृंदावन में रह रहे थे। वे लोग अनुष्का की माँ के देहांत के कुछ दिन बाद यहाँ आए थे।

माँ छह माह बीमार रही। गर्भावस्था के दौरान वह बीमार पड़ी थी और डॉक्टरों ने बताया कि उसे टी बी है। वह दवाइयाँ खाती रही मगर धीरे-धीरे कमजोर होती चली गई और अंततः एक स्वस्थ बच्चे को जन्म देने में सफल भी रही किन्तु बीमारी से इतना टूट चुकी थी कि दो माह बाद ही चल बसी।

अनुष्का के पिता ने, जो ग्वालियर में ड्राईवर के रूप में काम करता था, वृंदावन आने का निश्चय किया, जहाँ उसके माता-पिता रहते थे और उसकी माँ बच्चियों का पालन-पोषण कर सकती थी और उसके काम पर जाने पर उनकी देखभाल भी।

अनुष्का के दादा-दादी पिछले तीन साल से वृन्दावन में रहते हैं। दादा हमारे आश्रम के बिल्कुल पड़ोस में ही एक आश्रम में काम करता था लेकिन अपनी पोती को हमारे स्कूल में भर्ती कराने के तुरंत बाद, इसी मई में अपना पैर तुड़वा बैठा। बिना पैर के आश्रम में काम करना संभव नहीं रहा लिहाजा आश्रम वालों ने उसे तुरंत बाहर का रास्ता दिखा दिया।

सौभाग्य से अनुष्का के पिता के मालिक ने, जो वृंदावन के एक लोकप्रिय डॉक्टर हैं, उन्हें अपने घर में जगह दी। उनके घर के तलघर (बेसमेंट) में एक बड़ा सा कमरा है- लेकिन क्योंकि परिवार के पास कोई फर्नीचर इत्यादि नहीं है, उन्हें अस्पताल के बिस्तर पर ही सोना पड़ता है। बिस्तर भी डॉक्टर ने अपने क्लीनिक से लाकर दिया और इस तरह बिस्तर के अलावा उनका बाकी सामान नीचे, ज़मीन पर चारों तरफ बिखरा पड़ा रहता है। क्योंकि नीचे बहुत अंधेरा रहता है, वे अपना ज़्यादातर समय आधी सीढ़ियाँ चढ़कर वहीं गुज़ारते हैं।

उनके दादा की अब कोई आमदनी नहीं है और अब उनके दैनिक खर्चों की आपूर्ति उनके ड्राईवर पिता के 100 डॉलर यानी लगभग 6500 रुपए प्रतिमाह के वेतन से होती है। इस सीमित आय के चलते वे अपने मालिक के बड़े एहसानमंद हैं कि कम से कम उन्हें सर छिपाने के लिए एक छत तो मिली हुई है और उससे ज़्यादा खुशी की बात है कि अनुष्का हमारे स्कूल में मुफ्त पढ़ सकती है!

आप भी अनुष्का जैसे बच्चों की मदद के लिए किसी एक बच्चे को या उनके भोजन को प्रायोजित कर सकते हैं।

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