मैंने कल आपको मोनिका के अतिरेकी भय के बारे में बताया था, जिसके चलते डॉक्टरों को दो बार उसकी पट्टियाँ बदलने से पहले बेहोश करने की दवा देनी पड़ी थी। अब यह बताते हुए मुझे बड़ी ख़ुशी हो रही है कि कल उसने बिना एनिस्थिसिया लिए पट्टियाँ बदलवा लीं-और निश्चय ही उसे बिल्कुल दर्द नहीं हुआ! लेकिन ठहरिए, क्या, कब और कैसे हुआ, मुझे सब कुछ क्रमवार बताने दीजिए।
मैंने आपको बताया था कि हम मोनिका और उसकी माँ के लिए अस्पताल के पास एक जगह के इंतज़ाम की कोशिश कर रहे थे। डॉक्टरों ने हमसे कहा था कि कम से कम तीन से चार सप्ताह हर दूसरे या तीसरे दिन मोनिका को पट्टियाँ बदलने के लिए अस्पताल आना होगा और उसी वक़्त हम यह भी देख लेंगे कि उसके ज़ख़्म ठीक तरह से भर रहे हैं या नहीं। स्वाभाविक ही, इस स्थिति में उसे 150 किलोमीटर दूर वृन्दावन लेकर आना व्यर्थ होता।
काफी मशक्कत के बाद आखिर हमें एक गेस्टहाउस मिला, जो अस्पताल से सिर्फ एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित था और जिसके कमरों में भीतर ही संडास और बाथरूम का इंतज़ाम भी था। इसके अलावा गेस्टहाउस में ही एक कैंटीन की व्यवस्था थी, जहाँ से मोनिका और उसकी माँ अपने लिए खाना वगैरह मँगवा सकते थे। मोनिका की माँ खुद खाना बनाए यह उसकी देखभाल के चलते आसान नहीं था और उसके मुक़ाबले खाना मंगाना ज़्यादा उपयुक्त था। अगर हम एक कमरे का फ्लॅट लेते तो शायद वह खाना बना सकती लेकिन तब हमें सारे बरतन-भांडे, राशन-पानी, स्टोव आदि का इंतज़ाम भी करना पड़ता! और क्योंकि हम हर समय वहाँ नहीं रह सकते थे, उसे खुद इन चीजों की व्यवस्था करनी होती और मोनिका को अकेला छोड़ना पड़ता-और तब यह आवश्यकता से अधिक परेशानी का बायस बन सकता था!
बाद में यह समझ में आया कि अस्पताल के पास किसी होटल में कमरा लेना बेहतर विकल्प रहा। डॉक्टरों ने पहले हमें बताया था कि वे मोनिका को खड़ा करके और चलाकर देखेंगे लेकिन जब उसकी छुट्टी का समय आया तो पता चला कि गरदन की मांसपेशियों की कमजोरी की वजह से एकाध हफ्ते या दस दिन तक वह उठ भी नहीं पाएगी! इसका अर्थ यह था कि उसे एंबुलेंस के जरिए स्थानांतरित किया जाएगा!
इस तरह 3 जनवरी की शाम को, अस्पताल की लंबी डिस्चार्ज प्रक्रिया निपटाने के बाद एक एंबुलेंस गेस्टहाउस के सामने आकर खड़ी हुई और कुछ नर्सें उसे स्ट्रेचर पर रखकर कमरे में लेकर आईं। उन्होंने उसे बिस्तर पर लिटाया-और इसी तरह कल वे फिर गेस्टहाउस आये, उसे अस्पताल लेकर गए और वापस यहाँ लाकर छोड़ा।
मोनिका ने शाम को हमें फोन किया और कहा: "मैंने आपसे वादा किया था कि मैं बिना बेहोशी की दवा लिए अपनी पट्टियाँ बदलवा लूँगी! मैंने अपना वादा नहीं तोड़ा!" उसे गर्व था कि वह ऐसा कर पाई-और हमें भी! यह छोटी सी बच्ची, इतनी तकलीफ़ें झेलने के बाद खुश थी कि उसमें इतनी हिम्मत आ गई है कि अपने डर पर काबू पा सके!
रात को हम रमोना के पिता को दिल्ली विमानतल से लाने गए थे-और अगले सप्ताह मोनिका से मिलने फिर दिल्ली जाएँगे। हम यह देखने के लिए लालायित हैं कि उस समय तक वह कितना स्वस्थ हो गई है-और वह भी यहाँ वापस आने के लिए मचल रही होगी। स्वाभाविक ही, क्योंकि अब तक सिर्फ उसकी माँ का भाई और उसकी माँ का चाचा भर उससे मिलने अस्पताल आए हैं।
शल्यक्रिया से कुछ दिन पहले मोनिका की बड़ी बहन का फोन आया था कि उनके पिता उसे घर पर अकेला छोड़कर दिल्ली गए हैं। लेकिन मोनिका से मिलने नहीं। उनका पिता अभी अपने बड़े भाई के यहाँ रह रहा है जबकि उसकी एक किशोर-वय लड़की घर पर अकेली है क्योंकि आसपास रहने वाले उसके चाचा-चाचियों के साथ उनके अच्छे संबंध नहीं हैं और दूसरी एक कठिन शल्यक्रिया करवाने के बाद स्वस्थ हो रही है!
इस तरह सिर्फ हम होंगे जो मोनिका के पास होंगे। हमारी शुभकामनाएँ तो उसके साथ हैं ही, हम आपकी, अपने मित्रों की, मददगारों की, पाठकों की, मिलने-जुलने वालों की और सभी भला चाहने वाले लोगों की शुभकामनाएँ भी साथ ले जा रहे हैं! उन सभी लोगों का एक बार फिर बहुत-बहुत शुक्रिया जो हमारे इस अभियान में सहायक बने-कि इस छोटी सी बच्ची द्वारा भोगी गयी इतनी भयानक यातनाओं के बाद उसके चेहरे पर मुस्कान देख सकें और यही हमारा सबसे बड़ा पारितोषिक होगा!
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