अपने रहने की जगह को बैल के साथ साझा करते हुए – हमारे स्कूल के बच्चे – 31 जनवरी 2014

परोपकार

आज मैं आपका परिचय दो लड़कों से करवाना चाहता हूँ: राकेश और हर्षित। वे बारह और दस साल के हैं और हमारे स्कूल में पिछली जुलाई से पढ़ रहे हैं। मैं उनके बारे में विस्तार से बताता हूँ।

राकेश और हर्षित अपने पाँच भाई-बहनों में सबसे छोटे हैं। उनकी दो बड़ी वयस्क बहनें हैं, जिनकी शादियाँ हो चुकी हैं इसलिए वे अब इस घर में नहीं रहतीं। तो इस तरह दो लड़के उनकी एक बड़ी बहन और उनके माता-पिता ये पाँच लोग उस दो कमरे के घर में रह रहे हैं। और एक बैल भी!

जी हाँ, एक बैल, क्योंकि उनका पिता एक बैलगाड़ी का मालिक और चालक है और यही उस परिवार की आमदनी का जरिया भी है। बैलगाड़ी की यहाँ अक्सर ज़रूरत पड़ती रहती है लेकिन फिर भी यह किसी भी लिहाज से एक स्थायी काम नहीं है। शहर भर में अनेक निर्माणकार्य चल रहे हैं, जहां रेत, सीमेंट और दूसरे सामानों की ढुलाई में इनकी आवश्यकता पड़ती है मगर यहाँ बहुत से गाड़ीवान भी हैं और सही समय पर कामवाली जगह पर नहीं पहुंचे तो काम हाथ से निकलने में देर नहीं लगती! राकेश की माँ ने हमें बताया कि उसके पति के पास कई बार कोई काम नहीं होता और अधिकतर उसे सिर्फ तीन फेरे लगाकर ही संतोष करना पड़ता है। कुल मिलाकर, अपने बैल को खिलाने के बाद, जिसमें आमदनी का एक तिहाई खर्च हो जाता है, उनके पास परिवार के लिए बमुश्किल कुछ बच पाता है।

वे कहते हैं कि उनका काम किसी तरह चल ही जाता है लेकिन आप उनके घर पर नज़र दौड़ाएँ तो आप सोच में पड़ जाएंगे कि इतनी सी जगह में वे किस तरह रहते होंगे: छोटे वाले कमरे में माँ अपने तीन बच्चों को लेकर सोती है और ठंड में बड़े कमरे में बैल रहता है और वहीं उनका पिता भी सो जाता है।

शायद जगह की कमी के कारण ही बच्चे दिन का अधिकांश समय घर के बाहर गुजारना पसंद करते हैं। उनकी माँ बताती है कि घर में वे बिलकुल पढ़ नहीं पाते और जब से उन्होंने हमारे स्कूल जाना शुरू किया है तभी से उनकी लिखाई-पढ़ाई शुरू हुई है। जब हमने कुछ विस्तार से जानना चाहा तो उसने बताया कि पहले वे दूसरे स्कूलों में भी पढ़ चुके हैं मगर वहाँ कुछ खास सीख नहीं पाए।

जब हमने यह सुना तो बच्चों से बात की और पाया कि हालांकि पिछले स्कूल में राकेश पाँचवी कक्षा में पढ़ता था, हमारे यहाँ वह पहली कक्षा से पढ़ाई शुरू कर रहा है क्योंकि इससे ऊंची कक्षा की पढ़ाई का कोई ज्ञान उसे नहीं था। हर्षित, जो पहले वाले स्कूल में दूसरी कक्षा में था, अपना नाम तक लिख नहीं पाता था! अब हमारे स्कूल में उसने अंग्रेज़ी वर्णमाला सीख ली है और जल्द ही अपना नाम लिखना भी सीख जाएगा। इस जानकारी से हमारी इस आशंका को बल मिलता है कि सस्ते निजी स्कूल, जिनका खर्च ये गरीब परिवार उठा सकते हैं, उनके बच्चों को अच्छी पढ़ाई मुहैया नहीं कराते और इसी कारण हमें अपने काम से संतुष्टि प्राप्त होती है।

हम इन बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा प्रदान करने का संकल्प दोहराते हैं! बच्चों ने घर पर भी पूरी लगन के साथ पढ़ाई करने का वचन दिया है और हमें उम्मीद है कि वे तेज़ी के साथ तरक्की करेंगे। अगर वे दोपहर भर घर के बाहर खेलना-कूदना नहीं भी छोड़ते तो भी सबेरे हमारे यहाँ पर्याप्त ज्ञान हासिल कर सकेंगे! उनके शिक्षक हमें बताते हैं कि उन्हें दिया गया काम और होमवर्क वे समय पर पूरा करते हैं, हालांकि हर्षित कुछ बातूनी है और किसी एक काम पर ज़्यादा देर ध्यान केन्द्रित करना उसके लिए मुश्किल होता है। फिर भी वह उसे किसी तरह पूरा कर ही लेता है और इतने कम समय में ही काफी कुछ सीख चुका है।

हमें खुशी है कि हम इन बच्चों की थोड़ी बहुत मदद कर पा रहे हैं। आप भी हमारे इस काम में हमारी मदद कर सकते हैं: किसी एक बच्चे को प्रायोजित करके या बच्चों के एक दिन के भोजन का खर्च उठाकर!

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