आज पुनः अपने स्कूल के बच्चों से आपका परिचय करवाने का समय है। उनके नाम कीर्ति और सुमित हैं और वे क्रमशः छह और दस साल के हैं। दोनों ने इसी साल से हमारे स्कूल में पढ़ना शुरू किया है।
इस साल अप्रैल माह में जब हम उनके घर जा रहे थे तो हमें एक सँकरे दरवाज़े से भीतर जाना पड़ा, जिसके बाद उतनी ही सँकरी सीढ़ियाँ चढ़कर हम उनके छोटे से घर तक पहुँच सके, जो पहली मंज़िल पर ही स्थित है। हम एक लगभग खुली बालकनी पर खड़े थे, जहाँ से थोड़ा आगे की तरफ दो कमरे दिखाई दे रहे थे।
कीर्ति की माँ ने परिवार के सभी सदस्यों को बुलाया और तब कीर्ति और सबसे छोटे सुमित से और उनके भाई और उनके पिता से हमारा पहला परिचय हुआ। बच्चों में सबसे बड़ा उनका भाई मनोज है, जो एक दूसरे स्कूल में 7वीं कक्षा में पढ़ता है। वे जानते थे कि सभी बच्चों की फीस अदा करना उनके बस की बात नहीं है लिहाजा उन्होंने सोचा कि सुमित और कीर्ति को हमारे स्कूल में भर्ती करवा दिया जाए।
मालाएँ, जैसे भगवानों के चित्रों या छोटी-छोटी मूर्तियों वाली कंठियाँ आदि बनाकर बेचने का परिवार का व्यवसाय है, जिसे कीर्ति का पिता अपने भाई के साथ मिलकर संभालता है। उनके घर में हर तरह के मनके उपलब्ध हैं, जिन्हें धागे में पिरोकर और कई जगह गठानें लगाकर वे एक लटकन लटका देते हैं। उनके पास एक ठेला भी है और जब कोई धार्मिक उत्सव या यात्रा होती है तो ठेले पर सामान रखकर वे सड़कों के किनारे चलते हुए या कहीं रुककर अपना सामान बेचते हैं।
वृन्दावन तीर्थयात्राओं का शहर है इसलिए यहाँ बहुत से लोग परिक्रमा के लिए आते रहते हैं। ये तीर्थयात्री उनके संभावित ग्राहक होते हैं-और यह परिवार अपनी आजीविका के लिए उनके द्वारा की जाने वाली खरीदारी पर निर्भर होता है। उन्होंने हमें बताया कि कैसे हिमालय पर हुए पिछले साल के भयंकर हादसे के बाद उनका धंधा मंदा पड़ गया है क्योंकि उसके बाद से तीर्थयात्रियों की संख्या में कमी आ गई है।
फिर ठीक इस आर्थिक तंगी के बीच कीर्ति बुरी तरह बीमार पड़ गई। वे पहले ही परेशानी में थे, उसकी दवाइयों खरीदने में उनकी बची-खुची पूंजी भी स्वाहा हो गई और उनके पास स्कूल की फीस अदा करने के लिए कुछ भी न बचा। स्कूल ने उसे वार्षिक परीक्षा में बैठने की इजाज़त नहीं दी, बल्कि स्कूल से ही निकाल बाहर किया।
इस तरह वे हमारे पास आ गए, इस आशा में कि उनके दो बच्चे हमारे स्कूल में मुफ़्त पढ़ाई कर सकेंगे, जिससे उन्हें स्कूल फीस और पढ़ाई के दूसरे अतिरिक्त सामान्य खर्चों का बोझ नहीं उठाना पड़ेगा।
अब सुमित तीसरी और कीर्ति यू के जी में पढ़ रहे हैं। दोनों ही कुछ शर्मीले और संकोची हैं लेकिन पढ़ने में तेज़ हैं और जब वे आपसे खुलते हैं तो ज़ोर-शोर से ठहाकों के साथ हँसते हैं। उन्हें हँसते-खिलखिलाते और सीखते-पढ़ते देखना हमारे लिए बड़े संतोष और ख़ुशी की बात होती है!
आप भी सुमित और कीर्ति जैसे बच्चों की मदद कर सकते हैं! किसी एक बच्चे को या बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित कीजिए!
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