हमारे स्कूल के बच्चों के घरों का दौरा करने वाले पश्चिमी मेहमानों की प्रतिक्रियाएँ – 10 मार्च 2015

परोपकार

हर शुक्रवार को हम अपने स्कूल के बच्चों के घरों का दौरा करते हैं और मैं अपने ब्लॉग में उसके बारे में लिखता हूँ। आश्रम में आया कोई मेहमान जब हमारे साथ आने की इच्छा प्रकट करता है तो हम उसे भी साथ ले जाते हैं। इन दौरों में उन्हें होने वाले अनुभवों के बारे में आज मैं अपने ब्लॉग में लिखना चाहता हूँ और साथ ही वापस आने के बाद होने वाली उनकी प्रतिक्रियाओं के बारे में भी।

ये मेहमान भारत का वह दूसरा रूप देखते हैं जो यहाँ आने वाले सामान्य पर्यटक निश्चय ही नहीं देख पाते। यहाँ तक कि वे भी नहीं, जो खास तौर पर यहाँ के "ग्राम्य-जीवन" का अनुभव लेने आते हैं-क्योंकि वे गाँव, जहाँ ट्रेवल-एजेंट उन्हें ले जाते हैं, वह भी खास पर्यटकों की सुख-सुविधाओं का ध्यान रखते हुए चुना जाता है और गाँव के परंपरागत घरों में ही उनके रहने का अच्छा-खासा इंतज़ाम किया जाता है, समुचित ग्रामीण भोजन, चाय और नाश्ते परोसे जाते हैं। हमारे मेहमान वास्तविक परिवारों को और वास्तविक घरों को देखने जाते हैं, उनके आसपास का माहौल देखते हैं और विशेष रूप से यह देखते हैं कि वहाँ हमारे स्कूल के बच्चे किस तरह गुज़र-बसर करते हैं।

स्वाभाविक ही ये परिवार गरीब होते हैं और इसीलिए तो उनके बच्चे हमारे स्कूल में पढ़ने आते हैं। उनके घर अलग-अलग तरह के होते हैं। कुछ लोगों को पैतृक संपत्ति में घर मिला होता है तो उनके घर पर्याप्त बड़े होते हैं, कभी-कभी उनके यहाँ बाहर खेलने के लिए आँगन इत्यादि भी उपलब्ध होता है लेकिन दूसरी तरफ अधिकांश बच्चों के घर किराए से लिए गए होते हैं, किसी की मामूली झुग्गी होती है तो किसी का तीन दीवारों वाला, बिना पुता या आधा-अधूरा घर होता है, जिसे धूप और पानी से बचने के लिए प्लास्टिक की पन्नी से ढँक दिया गया होता है और उसका मासिक किराया भी अदा करना होता है! हमारा दौरा आकस्मिक होता है और हमें पता नहीं होता कि जब हम उनके घर जाएँगे तब वे किस हाल में होंगे-और स्वाभाविक ही हमारे साथ आने वाले मेहमान भी नहीं जानते! वे उनका दैनिक रहन-सहन देखकर हैरान और स्तब्ध रह जाते हैं। वे सोच भी नहीं सकते कि वहाँ लोगों को सामान्य मूलभूत सुविधाएँ भी उपलब्ध नहीं होतीं। अक्सर बिजली नहीं होती, पानी के लिए सड़क तक जाकर हैंड पंप से पानी निकालकर लाना पड़ता है और नित्यकर्म के लिए संडास या बाथरूम भी उपलब्ध नहीं होते।

हालांकि जाने से पहले आप तैयार होते हैं कि वहाँ क्या देखने को मिल सकता है फिर भी यथार्थ वहाँ बहुत अलग होता है: गंदी, सँकरी सड़कें और गलियाँ चलकर उनके घरों तक पहुँचना, यह तथ्य कि वहाँ आसपास कोई टॉयलेट उपलब्ध नहीं है और रेत में लोटते नंग-धड़ंग बच्चों को देखना, जहाँ आसपास ही छोटे-छोटे सूअर के बच्चे भी मुँह मार रहे हैं या गंदे पत्थरों, कमचियों से खेलते बच्चों को देखना।

यह सब देखकर आप यह महसूस किए बगैर नहीं रह सकते कि इसकी शिकायत करना भी व्यर्थ है। आप अपने जीवन को देखते हैं और महसूस करते हैं कि आप न सिर्फ भाग्यशाली हैं कि इतनी सारी सुविधाएँ पा गए हैं बल्कि "आपका पसंदीदा आइसक्रीम नहीं मिल रहा है" या "आपके पर्दे कालीन से मैच नहीं कर रहे हैं" जैसी बहुत सी बातों की शिकायतें करते हुए निहायत भोंडे भी लगते हैं। आप इस बात को समझने लगते हैं कि जिस भौतिक सुरक्षा के लिए आप चिंतित और परेशान हैं, वह महज आपके दिमाग का फितूर है।

इसे आप तब और भी शिद्दत के साथ महसूस करते हैं जब उन मुसकुराते चेहरों की ओर देखते हैं। उन आँखों की ओर, जो एक तरफ मूलभूत सुविधाओं से महरूम रहने की पीड़ा प्रकट करते हैं तो दूसरी ओर संतोष और उल्लास से दमक रही होती हैं।

हमारे विदेशी मेहमानों से अक्सर मिलने वाली प्रतिक्रियाएँ इस प्रकार होती हैं: इस बात पर आश्चर्य कि वे कितना सहज-सामान्य जीवन जीते हैं और यह कि लोग गरीबी में भी इतने खुश रह सकते हैं!

जितना खुश आप अभी रहते हैं, आपको उससे ज़्यादा खुश रहना चाहिए! बिल्कुल, इसमें कोई शक नहीं!

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