शौचालय होना ही बड़ी बात है, भले ही उसमें दरवाजा न हो! हमारे स्कूल के बच्चे- 13 दिसंबर 2013

परोपकार

पिछले हफ्ते मैंने निशा नाम की एक लड़की से आपका परिचय कराया था, जिसका पिता संगमरमर तराशने का काम जानता है मगर जिसे साल भर नियमित रोजगार प्राप्त नहीं हो पाता। आज बारी है निशा की चचेरी बहन अंजली की, जो बारह साल की है और उसी घर में अपने अभिभावकों, दो बहनों और एक भाई के साथ रहती है।

अंजली के पिता निशा के चाचा हैं यानी उसके पिता के छोटे भाई हैं। अंजली के पिता ने बचपन से पैसा कमाना शुरू कर दिया था। वह गल्ला-मंडी में जानवरों को भगाने का काम किया करता था, जिससे जानवर बेचने के लिए रखा चावल, गेहूं या दूसरा अनाज खा न जाएँ। जब तक उसके परिवार वालों ने उससे कोई ठीक-ठाक, ज़्यादा आमदनी वाला काम सीखने का दबाव नहीं डाला, वह यही काम करता रहा। फिर उसने अपने बड़े भाई से संगमरमर तराशने का काम सीख लिया।

उसके बाद से दोनों हमेशा एक साथ काम पर निकलते थे और कई साल तक अच्छा-खासा कमा भी लेते थे। फिर इस क्षेत्र में काम करने वालों की संख्या बहुत बढ़ गई और उन्हें पर्याप्त काम मिलना बंद हो गया। अपने भाई की तरह वह भी एक साल से काम ढूंढ़ रहा है। वे दोनों कभी-कभी दिल्ली या आगरा चले जाते हैं लेकिन काफी समय से कोई ऐसा काम, जो लंबे समय तक चलता रहे, उन्हें नहीं मिल पाया है।

निशा और उसका परिवार नीचे रहते हैं और अंजली के परिवार के पास पहली मंज़िल पर एक कमरे का मकान है। उसमें नीचे वाले मकान से भी कम जगह है क्योंकि वहाँ उन्होंने एक शौचालय भी बना लिया है। अंजली की माँ इस खर्च के बारे में बताते हुए कहती है, "मुझे खुशी है कि हमने यह शौचालय बनवा लिया है मगर पैसे की कमी के चलते हम उसमें दरवाजा नहीं लगवा पाए!" इसलिए वे दरवाजे की जगह एक पर्दा टाँगकर काम चला लेते हैं। छह लोगों के इस परिवार को अपने घर का दरवाजा हमेशा बंद रखना पड़ता है क्योंकि अगर उनका ध्यान हट जाए तो बंदर घर के भीतर घुसकर उनके सामान के साथ छेड़-छाड़ करते हैं, तहस-नहस कर देते हैं या उठाकर ही ले जाते हैं। वृन्दावन में बंदर बहुत ज़्यादा हैं और एक छत से दूसरी छत पर कूद-फांद करते रहते हैं।

फिर भी, छत पर उपलब्ध थोड़ी सी जगह का इस्तेमाल बच्चे होमवर्क करने के लिए कर लेते हैं। अंजली और निशा दोनों हमारे स्कूल की चौथी कक्षा में हैं और स्वाभाविक ही यह बहुत सुविधाजनक है: स्कूल की पढ़ाई में दोनों एक-दूसरे की मदद कर सकते हैं।

नेहा की तुलना में अंजली ज़्यादा बहिर्मुखी है और दोस्त बनाने में उसे देर नहीं लगती। वह पढ़ाई में भी अच्छी है और जब हम उससे, अभी चल रही, छमाही परीक्षा के विषय में पूछते हैं तो वह कहती है कि इस बार भी उसके पेपर अच्छे जा रहे हैं।

हमें खुशी है कि वह पढ़ाई में अच्छी तरक्की कर रही है-इसका अर्थ है कि उसका आने वाला कल बेहतर होगा, घर कुछ बड़ा होगा, उसमें रसोई होगी, सबके लिए सोने की जगह होगी और शौचालय में दरवाजा भी होगा!

%d bloggers like this:
Skip to toolbar