जीने के लिए आवश्यक न्यूनतम उपार्जन के लिए रोज 2000 पानी-पूरियाँ बनानी पड़ती हैं-हमारे स्कूल के बच्चे-13 जून 2014

परोपकार

आज शुक्रवार है और अपने स्कूल के किसी बच्चे से आपका परिचय करवाने का दिन। आज हेमा की बारी है, जो बारह बरस की है और हमारे स्कूल की दूसरी कक्षा में पढ़ती है।

हेमा का घर बाँस की चौखटों पर खड़ा मिट्टी का घर है, जिसका फर्श गोबर और रेत मिलाकर बनाया गया है। भारत में घर बनाने का यह बहुत पुराना और पारंपरिक तरीका है, जिसे गरीब लोग आज भी अपना घर बनाने के लिए अपनाते हैं क्योंकि उनके पास ईंट और सीमेंट खरीदने के लिए पैसे नहीं होते कि वे अपने लिए कोई ठीक-ठाक घर बनवा सकें। स्वाभाविक ही, इसके कुछ नुकसान हैं, जो मानसून की बारिश में दिखाई पड़ते हैं: ज़्यादा बारिश में दीवारें पानी सोख लेती हैं और कमजोर पड़ जाती हैं।

इसका लाभ यह है कि गर्मियों में ये घर ईंट-पत्थर और सीमेंट से बने घरों की तुलना में कम गर्म होते हैं इसलिए हेमा के परिवार जैसे लोग, जो पंखे, कूलर या एयरकंडीशनर का खर्च नहीं उठा सकते, गर्मियाँ सहन कर पाते हैं।

घर और वह ज़मीन, जिस पर घर खड़ा है, उन सात भाइयों और उनके परिवार की साझा संपत्ति है। वे लोग 22 साल पहले वृन्दावन आए थे और शुरू में सभी मजदूरी करते थे। मगर अब उनमें से दो भाइयों ने, जिनमें से एक हेमा का पिता भी है, कुछ नया काम करने के इरादे से दो छोटे-छोटे ठेले, एक बड़ा सा बक्सा और एक तसला खरीद लिया है, जिन्हें लेकर वे रोज़ मुख्य सड़क पर आ जाते हैं और वहाँ चाट का ठेला लगाकर आने-जाने वाले लोगों को पानी-पुरी, आलू-टिक्की आदि बेचते हैं!

हेमा के 18 वर्षीय बड़े भाई ने भी इस धंधे में हाथ बँटाना शुरू कर दिया है। सब मिलकर रोज़ 2000 पानी-पूरियाँ बनाते हैं। पानी-पुरी में छेद करके उसे जिस मसालेदार पानी में डुबोया जाता है, उसे बनाने में हेमा भी अपनी माँ की मदद करती है, मजदूरी की तुलना में इस धंधे में ज़्यादा कमाई है। इस धंधे में नए होने के कारण फिलहाल वे ज़्यादा नहीं कमा पाते मगर उन्हें उम्मीद है कि जल्द ही वे लगभग 100 $ यानी लगभग 6000 ₹ प्रतिमाह कमाने लगेंगे।

जब तक वे इस धंधे को अच्छी तरह जमा नहीं लेते, उनकी भैंस उन्हें इतना दूध देती रहेगी कि जिसे बेचने पर उन्हें पर्याप्त आमदनी होती रहे और घर का खर्च चलता रहे।

हेमा पिछले तीन साल से हमारे स्कूल में पढ़ रही है और हालांकि वह पढ़ाई में उतनी अच्छी नहीं है और अपनी कक्षा की बहुत प्रतिभाशाली विद्यार्थी भी नहीं है, उसकी शिक्षिकाएँ नहीं चाहती कि वह कक्षा में अनुपस्थित रहे। वह एक खुशमिजाज़ लड़की है, उसकी बहुत सी सहेलियाँ हैं और वह सबको हमेशा हँसाती रहती है। हम खुश हैं कि वह हमारे स्कूल में पढ़कर आगे बढ़ रही है और हम आशा करते हैं कि अभी कई साल वह हमारे स्कूल में पढ़ती रहेगी!

उसे और उस जैसे और भी कई बच्चों की मदद के हमारे सत्कार्य में आप भी सहभागी बनना चाहते हैं तो आप किसी एक बच्चे को प्रायोजित करके या हमारे स्कूल के बच्चों के एक दिन के भोजन की व्यवस्था करके ऐसा कर सकते हैं!

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