स्कूली पढ़ाई पर कभी-कभी खर्च कर देना कोई विकल्प नहीं है – हमारे स्कूल के बच्चे-12 सितम्बर 2014

परोपकार

आज फिर शुक्रवार है-अपने स्कूल के बच्चों से आपको मिलवाने का दिन। आज आप मिलेंगे कन्हैया और आरती नामक दो बच्चों से, जो इसी साल हमारे स्कूल में भर्ती हुए हैं।

ये बच्चे अपने परिवार के सबसे बड़े बच्चे हैं। उनका परिवार वृन्दावन के आसपास की किसी जगह का रहने वाला है लेकिन कुछ साल पहले काम के ज़्यादा अवसरों की अपेक्षा में यहाँ आकर बस गया। अब परिवार का मुखिया एक ऑटो रिक्शा चलाता है और उसकी आमदनी इस बात पर निर्भर होती है कि उस दिन उसे कितनी सवारियाँ मिलीं और उसने ऑटोरिक्शा के कितने चक्कर लगाए।

इस तरह उनकी सम्पूर्ण दिनचर्या इसी दैनिक आमदनी के अनुसार चलती है। जब किसी माह ज़्यादा काम मिल जाता है, वे ज़्यादा खर्च करने की हालत में होते हैं और जब काम कम होता है तो उन्हें बहुत से आवश्यक खर्च टालने पड़ते हैं। सुनने में यह बहुत सामान्य और तार्किक लगता है लेकिन वास्तविक जीवन में इसके परिणाम बड़े दुखद होते हैं: दस और आठ साल के उनके सबसे बड़े बच्चे स्कूल नहीं जा पाते। कई महीने ऐसे होते हैं जब परिवार के लिए भोजन का खर्च जुटाना ही मुश्किल होता है स्कूल फीस की तो बात ही छोड़िए। यह संभव नहीं है कि आप अपने बच्चों को किसी माह स्कूल भेजें और फिर दूसरे माह न भेजें! एक स्कूल में बच्चों को भर्ती कराने की उन्होंने कोशिश की थी मगर स्वाभाविक ही, बात बनी नहीं।

परिवार जो कुछ भी बच्चों के लिए कर सकता था, करता था, वे बच्चों को ट्यूशन पढ़ने के लिए भेजते, जिससे वे दूसरे बच्चों का दोहराना सुनकर कुछ सीख सकें। बाकी का दिन वे घर में मटरगश्ती करते हुए गुज़ार देते थे। जब हम उनके घर पहुँचे, वे सिर्फ चड्डी-बनियाइन पहने बैठे थे, उनके बाल बिखरे हुए थे और जंगलियों की तरह लग रहे थे। वास्तव में यह जानकर हमें आश्चर्य हुआ कि वे अंग्रेजी वर्णमाला और जोड़ना-घटाना जानते थे- हमने सोचा, ये तो हमारे स्कूल में अच्छे विद्यार्थी साबित होंगे!

और यही हुआ! वे अब स्कूल-पूर्व की पहली और दूसरी कक्षाओं में पढ़ते हैं और हालाँकि कन्हैया कक्षा का सबसे शैतान बच्चा है, पढ़ाई में भी वह बहुत अच्छा है और शिक्षिकाओं को पढ़ाई को लेकर उससे कोई शिकायत नहीं है!

कन्हैया तीन साल की उम्र में एक जानलेवा हादसे से भी गुज़र चुका है, जिसके कारण उसके शरीर पर स्थायी निशान बन गए हैं। एक बार सारा परिवार किसी विवाह समारोह में गया हुआ था। कन्हैया वहीं कहीं खेल रहा था तभी वह हादसा हुआ था: एक गैस सिलिंडर फट गया, जिसमें उस छोटे से बच्चे का आधा शरीर जल गया था। वह तीन माह अस्पताल में भर्ती रहा और मृत्यु के साथ कठिन संघर्ष करता रहा और बड़ी मुश्किल से डॉक्टरों की कड़ी मेहनत और देखरेख की बदौलत ही बच पाया।

स्वाभाविक ही माता-पिता मौत के मुँह से उसके बच निकलने पर बड़े खुश हुए-मगर इलाज के खर्च के लिए उन्हें दोस्तों और परिवार वालों से बड़ी रकम उधार लेनी पड़ी थी। हादसे के बाद कई साल तक उन्हें यह क़र्ज़ चुकाते रहना पड़ा था।

अब हालत यह है कि तीन लड़कियों और दो लड़कों के इस भरे-पूरे परिवार को एक अनिश्चित और अपर्याप्त आमदनी में अपना गुज़ारा करना पड़ रहा है। लेकिन उनकी एक परेशानी दूर हो चुकी है: उनके बच्चों की पढ़ाई सुनिश्चित हो चुकी है! हमारे स्कूल में वे न सिर्फ मुफ्त शिक्षा पा रहे हैं बल्कि मुफ्त भोजन भी पाते हैं-और हम आशा करते हैं कि आने वाला कल उनके लिए प्रगति के अनेकानेक द्वार खोलेगा!

बच्चों की सहायता के हमारे काम में आप भी सहभागी हो सकते हैं: किसी एक बच्चे को या स्कूल के बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करके।

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