एक घर, चार कमरे, चार परिवार – हमारे स्कूल के बच्चे – 14 नवंबर 2014

परोपकार

जब हम इस साल अपने स्कूल की भर्तियों के लिए नए बच्चों के यहाँ दौरे पर निकले तो प्रिया और हिमांशु के यहाँ भी पहुँचे। और एक बार फिर हमें एहसास हुआ कि एक कायदे के घर, जिसमें सभी के लिए जगह हो, क्या होता है।

जब हम पहुँचे तब हिमांशु अंदर सो रहा था और प्रिया दौड़कर उसे जगाने चली गई। इस बीच उसका बड़ा भाई भी, जो बाहर खेल रहा था, हमारे पास आ गया। उनकी माँ ने हमें बताया कि प्रिया के पिता ने पहले वेल्डिंग का काम सीखा था लेकिन इस क्षेत्र में उसे कोई रोजगार नहीं मिल पाया। इसलिए वह अभी वृन्दावन में ही किसी निर्माण स्थल पर साधारण मजदूर के रूप में काम कर रहा है। यह नियमित रोजगार नहीं है और इस काम में उसका कोई नियमित मालिक नहीं है और उसे रोज़ बाज़ार जाकर, जहाँ मजदूर और बिल्डर्स आपस में मिलते हैं, अपना श्रम बेचने के लिए बैठे रहना पड़ता है। जब नियमित रूप से रोज़ उसे काम मिलता रहता है तो माह भर में वह 3000 रुपए यानी लगभग 50 डॉलर कमा लेता है।

वे भाग्यशाली हैं कि उन्हें अपने घर का किराया नहीं देना पड़ता अन्यथा इतनी कम आमदनी में निर्वाह करना उनके लिए बहुत मुश्किल होता। घर उनका खुद का है-या कम से कम घर का चौथाई हिस्सा। यह घर प्रिया और हिमांशु के दादा ने बनवाया था और जब उसकी मृत्यु हुई तो वह उसके चार बेटों की मिल्कियत हो गई। इस तरह सबके पास अब एक-एक कमरा है और रसोई और एक थोड़ा बड़ा सा हाल है, जिन्हें सब भाई मिलकर साझा करते हैं।

यह एक पुराना घर है। वह गली और आसपास का इलाका दूसरे बहुत से निर्माणों के चलते समय के साथ थोड़ा ऊपर उठ चुका है लेकिन उन्होंने वहीं मकान बनवाया, जहाँ उन्होंने प्लॉट खरीदा था। इस तरह पूरा मकान मुख्य सड़क की सतह से आधा मंज़िल नीचे आ गया है। मकान में पीछे भी एक प्रवेशद्वार है, जो एक पतली गली में, जो मकान की सतह पर ही है, खुलता है। लेकिन अगर आपको मुख्य द्वार से प्रवेश करना है तो आपको कुछ सीढ़ियाँ नीचे उतरना पड़ता है।

हालांकि उन्हें किराए की बचत हो जाती है लेकिन आमदनी इतनी कम है कि परिवार का माह भर का खर्च पूरा करना भी प्रिया के माता-पिता के लिए मुश्किल होता है। जब प्रिया ने स्कूल जाना शुरू किया, उनकी यह चिंता और बढ़ गई क्योंकि अब उन्हें हर माह उसकी फीस भी भरनी थी। वे उसके बड़े भाई की फीस पहले ही अदा कर रहे थे और अब प्रिया और उसके बाद हिमांशु भी स्कूल जाने लायक हो गया था! उन्होंने पड़ोसियों से अपनी इस परेशानी का ज़िक्र किया और उन्होंने हमारे स्कूल की जानकारी दी।

और इस तरह जुलाई 2014 से प्रिया और हिमांशु हमारे स्कूल में पढ़ाई कर रहे हैं। दोनों ही बहुत खुशमिजाज़, चंचल बच्चे हैं और हमें खुशी है कि वे हमारे स्कूल में पढ़ाई करते हुए अपना समय प्रसन्नतापूर्वक गुज़ारते हैं! उनके अभिभावक भी खुश है: उनके बच्चे शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं और रोज़ उन्हें गर्मागरम भोजन भी मुफ्त प्राप्त हो जाता है। उनके लिए यह बहुत बड़ी मदद है और उनके बच्चों के लिए यह सुखद भविष्य की नीव है।

आप भी किसी एक बच्चे को या बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करके हमारी इस परियोजना में सहभागी हो सकते हैं।

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