भूखे नहीं मर रहे हैं मगर बच्चों को अच्छी पढ़ाई कराने का सामर्थ्य भी नहीं है- हमारे स्कूल के बच्चे- 25 अक्तूबर 2013

आज फिर शुक्रवार है, अपने स्कूल के बच्चों से आपको मिलवाने का दिन। जैसा कि अक्सर हम करते हैं, आज भी आप एक नहीं, दो बच्चों से मिलेंगे क्योंकि दोनों बहनें हैं। लक्ष्मी 13 साल की है और नेहा 10 साल की और दोनों ने 2009 से हमारे स्कूल में लोअर के जी से पढ़ाई की शुरुआत की थी। इस तरह लक्ष्मी ने नौ साल की उम्र में स्कूल जाना शुरू किया था। उसने कड़ी मेहनत करके अपनी पिछली पढ़ाई पूरी की और अब चौथी कक्षा में है। उसकी छोटी बहन तीसरी में है और दोनों ही बहुत खुशमिजाज़ और चंचल लड़कियां हैं।

जब हम उनसे मिलने उनके घर गए तब दोनों अपने पड़ोसियों के यहाँ कैरम, जिसे आप बिलियर्ड या पूल गेम का भारतीय रूप कह सकते हैं, खेलने गई हुई थीं। उन्हें दरवाजे से हम आते दिखे तो दोनों खुशी के मारे अपने घर की तरफ दौड़ पड़ीं और अपनी माँ और दादी को हमारे आने की खबर दी।

उनके माता-पिता वृन्दावन के ही रहने वाले हैं लेकिन इस इलाके में दोनों बच्चियों के जन्म के बाद से ही रहने लगे हैं। उस समय उन्होंने यहाँ एक कमरा बनवा लिया था। हर माह थोड़ा-थोड़ा करके कुछ सालों में वे इतनी बचत कर पाए कि उस कमरे को विस्तार देकर एक घर की शक्ल दे सकें। अब उनके मकान में सात कमरे हैं, रसोई और छोटा-सा संडास और बाथरूम भी है।

लक्ष्मी और नेहा के पिता ने घर से कुछ दूर सड़क से लगी हुई एक दुकान किराए पर ली और वहाँ एलेक्ट्रोनिक सामानों की दुकान खोल ली। आम तौर पर दुकान अच्छी चलती है क्योंकि गर्मी से बचने के लिए पंखे और कूलरों की मांग बनी ही रहती है। जब कभी धंधा मंदा पड़ जाता है तब वे घर का एक कमरा किराए पर चढ़ा देते हैं, जिससे परिवार का बजट बिगड़ता नहीं है। वे बहुत अमीर नहीं हैं मगर उनके पिता की दुकान इतनी पुरानी हो चुकी है कि उसे इलाके की एक स्थापित दुकान कहा जा सकता है। उनका जीवन बिना किसी विशेष परेशानी के गुज़र रहा है-लेकिन उन्हें भी एक सामान्य प्राइवेट स्कूल की फीस अदा करना संभव नहीं हो पाता। उनकी बच्चियाँ हमारे स्कूल में आती हैं, पढ़ाई करती हैं, भोजन करती हैं और उनके माता-पिता खुश हैं कि इससे उनका आर्थिक बोझ कुछ हल्का हो जाता है। अगर उन्हें किताबों, कापियों, स्कूल की वर्दियों के मद में खर्च करना पड़ता तो वे बहुत सी दूसरी वस्तुओं और कपड़े-लत्तों से वंचित रह जाते। कभी कभी मिलने वाला जेबखर्च भी उन्हें न मिलता और न ही दूसरी बहुत सी सुख-सुविधाएं ही मिल पातीं।

सिर्फ माता-पिता ही खुश नहीं हैं कि उनके बच्चे हमारे स्कूल पढ़ने आते हैं! दोनों बहनें भी बहुत खुश हैं और उन्होंने अपने बहुत से मित्र बना लिए हैं। हालांकि दोनों ही पढ़ाई में अव्वल नहीं हैं लेकिन उनके मन में सीखने की ललक है। नेहा को अक्सर कठिन विषयों की पढ़ाई में और पाठों के जटिल हिस्सों को समझने में शिक्षकों की अतिरिक्त मदद की ज़रूरत पड़ती है, लेकिन इसी काम के लिए हम यहाँ हैं: बच्चों को बेहतर शिक्षा प्रदान करना, जिससे वे अपना भविष्य उज्ज्वल बना सकें।

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