कोई स्वास्थ्य बीमा नहीं: जब कोई दुर्घटना आपकी ज़िन्दगी बदलकर रख देती है – हमारे स्कूल के बच्चे – 27 मार्च 2015

आज मैं आपका परिचय हमारे स्कूल की सबसे निचली कक्षा, लोअर किंडरगार्टन यानी एल के जी में पढ़ने वाले लड़के से करवाना चाहता हूँ। यह स्कूली पढाई से पहले की कक्षा है और सामान्यतया उसमें लगभग 5 साल की उम्र के बच्चे पढ़ते हैं। आज मैं जिस बच्चे से आपको मिलवाने जा रहा हूँ, वह 10 साल का है और उसका नाम नज़ीर है।

पाँच बच्चों में नज़ीर दूसरे नम्बर का लड़का है और पिछले साल से ही स्कूल जा सका, इसका एक विशेष कारण है: जब वह पाँच साल का था, उसका पिता दुर्घटनाग्रस्त हो गया और इस हादसे ने उनके जीवन की दिशा ही बदलकर रख दी!

नज़ीर का पिता मजदूर ही था मगर सामान्य मजदूर नहीं बल्कि उससे थोड़ा ऊपर, एक राजमिस्त्री था। वह बहुत अधिक नहीं कमा पाता था लेकिन किसी तरह अपने बाल-बच्चों का भरण-पोषण कर लेता था। उनके पास थोड़ी सी ज़मीन और उस पर एक घर था। इसके अलावा, उस पर उन्होंने ऊपरी मन्ज़िल बनवाने का काम भी शुरू किया था। फिर, 2010 में एक दिन वह अपने घर की छत से नीचे गिर पड़ा और अपना एक हाथ, एक पैर तुड़वा बैठा और उसके सिर भी फूट गया। अस्पताल जाना पड़ा और उसे स्वस्थ होने में कई हफ्ते लग गए लेकिन इसके बाद भी दर्द बना रहा।

वह अस्पताल का खर्च वहन करने में असमर्थ था, इतना दर्द रहता था कि वह कोई काम भी नहीं कर सकता था। उन्हें अपना घर बेचना पड़ा और उन्होंने एक गरीब बस्ती में ज़मीन का एक टुकड़ा खरीदा। किसी जान पहचान वाले की आर्थिक मदद लेकर एक कमरा बनवा लिया और पर्दादारी के लिए दो मामूली दीवारें भी खड़ी कर लीं। बची हुई थोड़ी सी ज़मीन में बगीचा लगा लिया और अब एक कमरे के उस छोटे से नए घर में सात सदस्यों वाला वह परिवार रह रहा है। लेकिन मासिक खर्चों का क्या? उसके लिए पैसे कहाँ से आते?

तब वे कुछ बकरियाँ खरीदकर पालने लगे। उनका दूध घर में काम आता था और थोड़ा-बहुत दूध बेच-बाच भी लेते थे। वे जानते हैं कि पूरी तरह शाकाहारी शहर, वृन्दावन छोड़ते ही बकरियाँ कत्ल कर दी जाएँगी, हालाँकि खुले तौर पर वे यह बात मानने के लिए तैयार नहीं होते। सबसे बड़ा लड़का, जो अब 18 साल का हो चुका है, जल्द ही प्लास्टर ऑफ पैरिस का काम सीखने लगा और फिर परिवार का भरण-पोषण करने वाला मुख्य सदस्य बन गया। वह 6500 रुपए यानी लगभग 75 डॉलर मासिक कमा लेता है। और अब 13 साल उम्र का दूसरा लड़का भी काम करने लगा है, हालाँकि वह एक स्कूल में पढ़ने भी जाता है। वह देवताओं की मूर्तियों के कपड़े सिलता है और 600 रुपए यानी लगभग 10 डॉलर प्रतिमाह कमा लेता है। जिस दर्जी के पास वह काम करता है, वहाँ से रोज़ कपड़े की कतरनें उठा लाता है और उनसे उसकी माँ रस्सियाँ बट लेती है, जिसे वे एक लकड़ी के चौखट पर बुन लेते हैं-और लो, बच्चों के बिस्तर तैयार हो गए!

अब परिवार किसी तरह अपना खर्च चला पा रहा है। इन सब समस्याओं के चलते नज़ीर को किसी स्कूल में भर्ती कराना उनके लिए कतई महत्वपूर्ण नहीं था और इसलिए वह अभी, पिछले साल से ही हमारे स्कूल में पढ़ने आया है-यानी 10 साल की उम्र में पहली बार किसी स्कूल का मुँह देख पाया है!

नज़ीर बहुत खुशमिजाज़ बालक है और स्वाभाविक ही, लिखना और पढ़ना उसने बहुत जल्दी सीख लिया। उसे स्कूल जाना पसंद है और हम आशा करते हैं कि जो शिक्षा हम उसे प्रदान कर रहे हैं वह उसके भविष्य और संभवतः उसके परिवार के भविष्य में बदलाव लेकर आएगी।

अगर आप उस जैसे दूसरे बच्चों की मदद करना चाहें तो किसी एक बच्चे को या बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करके ऐसा कर सकते हैं!

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