पिछले अनुभव से मोनिका को लगे मानसिक आघात के बारे में – 5 जनवरी 2015

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

शुक्रवार को मैंने आपको बताया था कि मुझे गुड़गाँव में एक दिन और रुकना पड़ा क्योंकि डॉक्टरों ने मोनिका की पट्टियाँ एक बार और बदलने और फिर उसे खड़ा करके और चलाकर देखने के बाद 3 जनवरी को छुट्टी देने का फैसला किया था। आज और कल मैं आपको इस बात के बारे में विस्तार से बताऊँगा कि वास्तव में मोनिका के साथ क्या हुआ और क्या हो रहा है।

3 जनवरी की सुबह हमारे पास मोनिका की माँ का फोन आया, जिसमें उसने मुझसे कहा कि मोनिका मुझसे बात करना चाहती है। मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि तब तक उसने कभी मुझसे बात करने के लिए फोन नहीं किया था। उसने कहा: 'कृपा करके डॉक्टरों को पट्टियाँ बदलते समय मुझे बेहोश करने के लिए कहें!' मैंने कहा, तुम ऐसा क्यों सोच रही हो? तब उसने बताया कि उसे डर है कि पट्टियाँ बदलते समय उसे बहुत दर्द होगा। मैं कुछ देर उसे दिलासा देता रहा और फिर फोन रमोना को दे दिया क्योंकि उसके साथ भी मोनिका का बहुत लगाव हो गया है। हम दोनों ने उससे कहा कि इसमें डरने की कोई बात नहीं है मगर हम दोनों ही सोच रहे थे कि आखिर यह ख़याल उसके मन में आया कैसे कि सिर्फ पट्टी बदलने के लिए भी डॉक्टर उसे बेहोश करने की दवा देंगे!

हमें इसका कारण कुछ देर बाद पता चला जब हम खुद अस्पताल पहुँचे: मोनिका दर्द की कल्पना से बहुत डरी हुई थी इसलिए बिना एनिस्थिशिया लिए डॉक्टरों को पट्टियाँ बदलने नहीं दे रही थी। जब डॉक्टर इस छोटे से काम के लिए आए वह बुरी तरह घबरा गई थी।

डॉक्टर ने मुझसे कहा कि इस काम में बिल्कुल दर्द नहीं होता। उसे महसूस तो होगा मगर यह दर्द पैदा बिल्कुल नहीं करेगा। दो साल के बच्चे को तो हम एनिस्थिशिया देते हैं मगर तीन या चार साल के बच्चे यह काम आसानी से करवा लेते हैं। वे आम तौर पर बच्चे को बातचीत में लगा देते हैं लेकिन मोनिका तो आँख भी मिलाना नहीं चाहती। वह सिर्फ अपनी माँ की तरफ ध्यान लगाए हुए है और उससे कह रही है कि हमें वहाँ से जाने के लिए कहे और कहे कि वे यह काम न करें; बस, बेकार डर रही है। और इस तरह दो बार- 31 दिसम्बर 2014 और उस दिन यानी 3 जनवरी 2015 को- डॉक्टरों ने एनिस्थिशिया देकर ही उसकी पट्टियाँ बदली हैं।

डॉक्टर ने बताया कि वास्तव में यह डर पहले कभी हुए भीषण दर्द के अनुभव के कारण है। शायद उसने पहले किसी अस्पताल में पट्टियाँ बदलवाते समय बहुत दर्द महसूस किया होगा। और वाकई गर्मियों में मोनिका का इलाज एक अन्य अस्पताल में हुआ था और हमें उसकी माँ ने बताया था कि उस अस्पताल में ज़ख्म साफ़ करने वाला कोई नहीं होता था इसलिए बिना किसी अनुभवी मददगार के खुद वही ज़ख्म साफ़ करने और मरहम पट्टी करने का काम किया करती थी। हम कल्पना कर सकते हैं कि मोनिका को उस वक़्त कितना दर्द होता होगा कि जिसका भय आज दर्द की एक मानसिक व्याधि में तब्दील हो गया है!

मोनिका के डॉक्टर के साथ बातचीत में उसने मुझसे कहा कि मैं मोनिका से बातचीत करके उसे मानसिक रूप से तैयार करूँ कि वह बिना एनिस्थिशिया लिए पट्टियाँ बदलवाने के लिए तैयार हो जाए। क्योंकि हर बार बेहोश करने वाले डॉक्टर (एनिस्थीटिक) को बुलवाना पड़ेगा जो न सिर्फ ज़्यादा खर्चीला होगा बल्कि उसके शरीर के लिए भी इतनी अधिक मात्रा में ये दवाएँ लेना नुकसानदेह होगा!

मैंने उससे बात की। रमोना ने की। और उसका क्या नतीजा निकला, अब मोनिका कहाँ है, क्या उसने आज बिना बेहोश हुए पट्टियाँ बदलवा लीं, यह सब मैं कल ही बता पाऊँगा।