मोनिका के स्वास्थ्य-लाभ की जानकारी – फिर से खड़ा होना और चलना – 13 जनवरी 2015

मैंने आपको बताया था कि कल हम मोनिका के यहाँ गए थे– और यह भी कि उसे देखकर हमें बड़ा संतोष हुआ और खुशी भी हुई! इस बीच उसने अच्छी प्रगति की है!

मोनिका के मामले में आगे और क्या किया जाना है, यह जानने के लिए जब मैं डॉक्टरों से मिलने अस्पताल गया तो मोनिका भी वहीं मिल गई। वह अपनी पट्टियाँ बदलवाने अस्पताल आई थी इसलिए मैं भी यह देख सका कि पट्टियों के नीचे के जख्म किस हालत में हैं। यह देखकर आश्चर्य होता है कि अगर आधुनिक दवाओं का इस्तेमाल सही तरीके से हो तो वे कितनी जल्दी असर करती हैं! एक बार मुझे फिर उसकी माँ की बात याद आ गई कि गर्मियों में कैसे सरकारी अस्पतालों में जब पट्टियाँ बदली जाती थीं तो हर बार ज़ख़्मों से भलभलाकर खून निकलने लगता था! इस बार ज़ख़्मों को देखने से पता चलता है कि जांघ से त्वचा निकालकर आँखों, छाती, गरदन और ठोढ़ी पर लगाते समय बड़ी सावधानी बरती गई है और बहुत सुघड़ता के साथ टाँके लगाए गए हैं। बूंद भर रक्त बाहर निकला, पीप नहीं था और बस जख्म लगभग साफ हो चला था!

एंबुलेंस में मोनिका के साथ बैठकर ही हम होटल आए और इसलिए रमोना और उसके पिताजी भी मेरी इस प्रसन्नता में सहभागी हो सके: मोनिका चलने लगी है! वह सतर्कतापूर्वक धीरे-धीरे पैर बढ़ाते हुए एंबुलेंस से नीचे उतरी और उतरते ही इतनी आत्मविश्वास से भरी दिखाई दी कि खुद चलकर भीतर गई।

निश्चय ही हमें फोन पर इसकी जानकारी मिल चुकी थी। तीन दिन पहले उसकी माँ ने हमें बताया था कि डॉक्टरों ने उससे बैठने के लिए कहा है और जब वह बैठी तो बड़ी सतर्कता के साथ खड़ा होने की कोशिश की और उसमें सफल भी हो गई। लेकिन इसे अपनी आँखों से देखना अलग ही बात थी। अब न सिर्फ वह कमरे में कुछ कदम चलती है बल्कि सारे गेस्ट हाउस में चहल-कदमी करती रहती है! यहाँ तक कि उसने बगल वाले कमरे में कुछ यूरोपियन पर्यटकों से दोस्ती भी गाँठ ली है!

अधिक बारीकी के साथ देखने पर पता चलता है कि आँख पर लगी उसकी पट्टी कुछ ऊपर खसका दी गई है, जिससे नीचे से वह बाहर देख सके और अपनी उस आँख को, जिस पर शल्यक्रिया की गई है, झपका सके। अब वह अपनी पलकों की शक्ति से उसे बंद कर सकती है। गरदन की पट्टियों के कारण अभी वह अपनी ठुड्डी नीचे नहीं कर पाती मगर खुशी की बात है कि वह उसे ऊपर उठा पाती है। जली हुई त्वचा के कारण पहले वह ऐसा भी नहीं कर पाती थी।

मुझे लगता है कि यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि पहले से वह सिर्फ शारीरिक रूप से ही बेहतर नहीं है! वह अब अच्छे मूड में भी है, हालांकि हमें लगा कि सामान्य दिनों में गेस्ट-हाउस में भी उसे कभी-कभी बहुत ऊब होती होगी। हालाँकि उसके कमरे में टीवी था-लेकिन सिर्फ टीवी का मनोरंजन ही पर्याप्त नहीं होता इसलिए हम उसके लिए कुछ उपहार भी लेकर आए थे: बोर्ड गेम का एक सेट, कुछ रंगीन पेंसिलें, क्रेयोन्स, एक किताब और एक नोटबुक, जिससे वह कुछ लिख सके या चित्र इत्यादि बना सके! मकसद यह कि वह अपने आपको उनमें व्यस्त रख सके।

और हाँ, जब हमने पूछा कि खाने के लिए उसे कुछ खास चाहिए क्या तो उसने उसी वस्तु की मांग की, जिसकी मांग आश्रम से बाहर होने पर अक्सर अपरा भी करती रहती है: चाओमिन, सब्जियों वाला चाइनीज़ नाश्ता! सेब, आम और अनार के रस के अलावा उसके लिए हम वह भी लेकर आए! निश्चित ही कल रात उसने अच्छी-ख़ासी पार्टी की होगी!

वहाँ से निकलने से पहले हम उसे खुद तैयार किया हुआ अपरा के जन्मदिन की पार्टी में आए बच्चों और शिक्षिकाओं का वीडियो और कुछ चित्र दिखाना नहीं भूले: उसमें उन्होंने अपना संदेश रिकार्ड कर रखा था-“मोनिका जल्दी ठीक हो जाओ!” यह और दुनिया भर के लोगों की सदिच्छाओं ने एक बार फिर उसके चेहरे पर मुस्कान ला दी!

डॉक्टरों ने फिर कहा कि मोनिका की पट्टियाँ अभी दो या तीन हफ्तों तक हर दूसरे या तीसरे दिन बदलनी पड़ेंगी। यानी तब तक मोनिका को वहीं गेस्ट-हाउस में रहना होगा-और अगले हफ्ते जब मैं वहाँ जाऊँगा तब वहाँ की अगली रिपोर्ट आपको दूँगा!

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