पैसे का मतलब है, सब्जियाँ खा सकते हैं, पैसा न होने का मतलब है नमक के साथ रोटी खाओ – हमारे स्कूल के बच्चे – 4 जुलाई 2014

परोपकार

आज मैं आपका परिचय हमारे स्कूल में पढ़ रहे एक बच्चे, दीनदायल से करवाना चाहता हूँ। दीनदयाल दस साल का है और अपने छह सहोदरों में सबसे छोटा है। पिछले साल से वह हमारे स्कूल की पहली कक्षा में पढ़ रहा है।

जब हम दीनदयाल के घर पहुंचे तो एक बहुत छोटी बच्ची बाहर आँगन में खेलती दिखाई दी और उसकी बड़ी बहन घर पर ही थी। लेकिन उसने तुरंत अपनी माँ और दूसरी बहन को पुकारा, जिससे हम उनसे बात कर पाएँ। दीनदयाल की माँ ने हमें बताया कि बाहर जो छोटी बच्ची खेल रही है वह उसकी पोती है, उसके सबसे बड़े लड़के की बेटी। उसके दो लड़कियाँ और चार लड़के हैं, जिनमें से दीनदयाल सबसे छोटा है। उसके दो लड़के और एक लड़की घर में रहकर पढ़ाई कर रहे हैं और हरियाणा के किसी स्कूल में परीक्षा देने जाते हैं, जहाँ उसकी दादी रहती है। फिलहाल सिर्फ दीनदयाल ही नियमित स्कूल जा रहा है।

दीनदायल का पिता मजदूर है। वह दूसरों के खेतों में बुआई और फसल की कटाई आदि के काम करता है। इस काम की उसे नगद रोजंदारी मिलती है मगर वह अपने परिवार के लिए अनाज भी घर ले जा सकता है। फसल के समय उसके पास पर्याप्त काम होता है और तब वह प्रति माह 170 डॉलर यानी लगभग 10000 रुपए तक कमा लेता है। मगर उसके बाद जब खेतों में बीज पड़ चुके होते हैं और उन्हें सिर्फ उगना, बड़ा होना और पकना होता है तो उसके पास कोई काम नहीं होता और तब वह कुछ भी नहीं कमा पाता।

दीनदयाल की माँ की बातों से चित्र स्पष्ट हो जाता है: जब पैसा होता है तब हम सब्ज़ी के साथ रोटियाँ खाते हैं और जब पैसा नहीं होता तो नमक-रोटी खाकर गुज़ारा करना पड़ता है।

लेकिन जब खेतों में काम नहीं भी होता तब भी वे अपनी भैंस की बदौलत कुछ न कुछ कमा ही लेते हैं। भैंस लगभग पाँच लीटर दूध रोज़ देती है, जिसे बेचा जा सकता है। इसलिए वे निश्चित रूप से कभी नहीं जान पाते कि कब कितनी रकम हाथ आती है मगर अक्सर वे किसी न किसी तरह गुज़ारा कर लेते हैं- वह भी तब, जब घर में खाने वाले, छह बच्चों, एक बहू और एक नातिन को मिलाकर, कुल दस लोग हैं।

उनका पुश्तैनी घर है, जिसमें चार कमरे और एक रसोई है। हमारे स्कूल के दूसरे बच्चों की तुलना में इनका घर काफी बड़ा है, भैंस रखने के लिए भी पर्याप्त स्थान उपलब्ध है, जहाँ वह दिन भर जुगाली करती रहती है और वहीं बच्चे भी खेलते रहते हैं। फिर भी घर बहुत साधारण सा है, बहुत सी दीवारों पर प्लास्टर नहीं किया गया है, सिर्फ ईंटों पर ही चूना पोत दिया गया है। लेकिन है वह उनका अपना।

दीनदयाल के मन में पढ़ने का ज़्यादा उत्साह नहीं है। वह बताता है कि घर में भी वह ज़्यादा पढ़ाई नहीं करता-स्वाभाविक ही उसकी शिक्षिकाएँ भी यह समझती हैं। लेकिन कक्षा में वह अच्छे से अच्छा करने की कोशिश करता है। शिक्षा उसके सामने भविष्य के दरवाज़े खोलेगी और हम जो भी कर सकते हैं वो प्रयास कर ही रहे हैं, जिससे उसकी पढ़ाई में निखार आ सके।

अगर आप हमारी परियोजनाओं के क्रियान्वयन में कुछ मदद करना चाहते हैं तो किसी एक बच्चे को या स्कूल के बच्चों के एक दिन के भोजन के खर्च को प्रायोजित करके ऐसा कर सकते हैं।

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