धर्मशाला में रहने को मजबूर – हमारे स्कूल के बच्चे-10 जनवरी 2014

परोपकार

आज, अपरा के जन्मदिन के दो दिन बाद, मैं आपको अपने स्कूल के बहुत से बच्चों में से दो ऐसे बच्चों से मिलवा रहा हूँ, जिन्हें अपरा उनके नामों से जानती है क्योंकि वे अक्सर आश्रम में ही रहते हैं और अपरा और आश्रम के दूसरे बच्चों के साथ खेलते रहते हैं। वे 14 और 12 वर्ष के कृष्ण और शंकर हैं और क्रमशः छठवीं और चौथी कक्षाओं में पढ़ते हैं।

वे अपने बड़े भाइयों और अभिभावकों के साथ एक ऐसी इमारत में रह रहे हैं, जो स्थानीय लोगों में 'धर्मशाला' नाम से ही जानी जाती है। लगभग बीस कमरों से तीन ओर से घिरा यह एक बहुत बड़ा प्रांगण है, जिसे पहले टूरिस्ट्स और बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं को किराए पर दिया जाता था। लेकिन अब बहुत साल से वहाँ हर कमरे में एक-एक परिवार रह रहा है। वे सब सामूहिक शौचालय का इस्तेमाल करते हैं, जो पश्चिमी लोगों की नज़रों में बड़ी बुरी हालत में और बेहद गंदे मालूम पड़ सकते हैं। लेकिन यही शौचालय वहाँ रहने वालों के लिए बहुत बड़ी सुविधा और विलासिता हैं। कम से कम उन्हें सड़क के किनारे या खेतों में शौच के लिए नहीं जाना पड़ता!

जब हम पिछली बार इस परिवार से मिलने गए थे तब वे लोग किसी दूसरे कमरे में रहा करते थे। इस बीच उस अहाते का प्रबन्धक बदल गया था और उसने कुछ परिवारों से उनके कमरे खाली करवा लिए थे। दो साल बाद जब प्रबन्धक दोबारा बदला गया तो उन लोगों को पुनः वापस बुला लिया गया और उन्हें दूसरे कमरे दिये गए। बच्चों के लिए यहाँ रह पाना बड़ी बात है: वहाँ रहने वाले बहुत से दूसरे बच्चों के साथ खेलने के लिए यहाँ सुरक्षित स्थान भी उपलब्ध है।

अभिभावक भी खुश हैं लेकिन 20 यू एस डॉलर यानी लगभग 1200 रुपए, जो किराये के रूप में उन्हें अदा करने पड़ते हैं, उनके लिए बहुत ज़्यादा हैं। लेकिन क्या करें, उन्हें कहीं न कहीं तो रहना ही होगा और वे बताते हैं कि इससे कम किराए पर ऐसी जगह कहीं नहीं मिल सकती।

कृष्ण का पिता सिक्यूरिटी गार्ड है और उसका वेतन 50 यू एस डॉलर यानी लगभग 3000 रुपए माहवार है। उसका बड़ा बेटा बिजली का काम सीख रहा है और अभी उसकी कोई आमदनी नहीं है। तीन बच्चों और अपने लिए कपड़े-लत्तों की व्यवस्था में, घरेलू खर्चों में, भोजन और दूसरी चीजों के इंतज़ाम में एकमात्र इसी आमदनी का सहारा होता है और वे देखते हैं कि माह के अंत में उनके पास कुछ भी नहीं बच पाता। इसके बावजूद उनका सपना है कि एक न एक दिन उनके पास खुद का घर होगा।

इसलिए उन्हें खुशी है कि उनके दो छोटे लड़के हमारे स्कूल में मुफ्त शिक्षा और मुफ्त भोजन प्राप्त करते हैं। पहली कक्षा से ही यानी पिछले छह साल से वे दोनों हमारे साथ हैं। कृष्ण पहले बहुत उधमी और शैतान था लेकिन अब थोड़ा बड़ा होने के बाद काफी जिम्मेदार किशोर के रूप में विकसित हो गया है और शिक्षक उस पर कई महत्वपूर्ण काम, जैसे भोजन परोसना या बहुत छोटे बच्चों पर नज़र रखने का काम, सौंप देते हैं। अपने भाई की तुलना में शंकर बहुत शांत प्रकृति का मेहनती लड़का है और उसके शिक्षक पढ़ाई-लिखाई के संदर्भ में अक्सर उसकी प्रशंसा करते रहते हैं।

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