आज फिर शुक्रवार है, और दिन है हमारे स्कूल के किसी बच्चे से आपको मिलवाने का। आज मनोज की बारी है। मनोज दस साल का लड़का है और अपनी माँ, बड़े भाई और बड़ी बहन के साथ वृन्दावन के एक काफी गरीब इलाके में एक छोटे से मकान में रहता है। उसके पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं।
मनोज की माँ बताती है कि तीन साल पहले तक भी इस छोटे से परिवार का जीवन बहुत भिन्न था। सच्चाई यह है कि वह बहुत सामान्य था। उसका मजदूर पति सबेरे काम पर चला जाता था और शाम को रोजंदारी लेकर वापस आता था, जिससे वे खाने का सामान खरीद लेते थे और मकान का किराया चुकाते थे। आमदनी ज़्यादा नहीं थी मगर वे किसी तरह चला रहे थे। मनोज की माँ बच्चों की देखभाल और घर के कामकाज करती थी।
फिर अचानक उसका पति बीमार पड़ गया। उसके सारे शरीर में दर्द उठता था और कभी-कभी बुखार भी आ जाता था। वह डॉक्टर के पास गया और कुछ दवाएं ले आया मगर कोई फायदा नहीं हुआ। उसका दर्द जाता ही नहीं था और उसने फिर डॉक्टर को दिखाया । कई जाँचें (tests) करवाई गईं, बहुत रुपया खर्च किया गया लेकिन उसका डॉक्टर मर्ज समझ ही नहीं पाया। एक सप्ताह बाद उसकी मौत हो गई और माँ अपने तीन बच्चों के साथ अकेली रह गई। क्या उसे कोई गंभीर बीमारी थी, जिसे डॉक्टर मालूम नहीं कर सका? क्या डॉक्टर अयोग्य था और क्या उसकी जान बचाई जा सकती थी? अब निश्चित रूप से कोई नहीं जान सकता।
उसने मदद के लिए अपने परिवार का रुख किया और तबसे उसके माता-पिता, भाई और उसकी एक बहन जब भी संभव होता है और उसे सख्त ज़रूरत होती है, उसे कुछ रुपया भेजते रहते हैं। वह बताती है कि उसका शरीर इसकी इजाज़त नहीं देता कि वह कोई सख्त काम कर सके मगर बहुत विस्तार से वह बताने में हिचकिचाती है। उसकी बहन वृन्दावन में ही ब्याही है और अब दोनों ने पास-पास रहने का निर्णय लिया है, जिससे आवश्यकता पड़ने पर उसकी मदद हो सके।
तो बहन का परिवार भी मनोज के पड़ोस में ही तीन कमरे के एक किराए के मकान में रहने लगा है, जिसमें से एक कमरे में एक भैंस बंधी रहती है। मनोज की माँ गोबर इकट्ठा करती है, उसे सुखाकर बेचती है। भारत मे कई लोग आज भी खाना पकाने की आग जलाने के लिए गोबर के कंडों का इस्तेमाल करते हैं। खर्च का बहुत छोटा हिस्सा ही इससे जुड़ पाता है और उसे किसी गिनती में लेना ही बेकार है। वे आशा कर रहे हैं कि जब भैंस बच्चा जनेगी तो इतना दूध तो देगी ही कि वे दूध बेचकर भी थोड़ा-बहुत अतिरिक्त रुपया कमा सकें।
मनोज अपने पिता की याद करके दुखी तो होता है लेकिन अभी वह पूरी तरह समझ नहीं पाता कि परिवार में कमाने वाले की मृत्यु के क्या नतीजे होते हैं। वह अपनी माँ से मिठाई या नमकीन खाने के लिए गाहे-बगाहे जेब-खर्च की मांग करता रहता है, जैसा कि दूसरे बच्चे भी अक्सर करते ही रहते हैं।
उसकी माँ हमें बताती है कि वह बहुत खुश है कि उसका बेटा, मनोज अब हमारे स्कूल जा सकता है और उसे फीस भी नहीं देनी होगी और किताबें, वर्दी और लिखने पढ़ने का सामान खरीदने का खर्च भी वहन नहीं करना होगा। इसका अर्थ यह होगा कि अब वह अपने बच्चों की छोटी-मोटी इच्छाओं की पूर्ति कर सकेगी।
हर दिन मनोज अपने मौसेरे भाई टिंकू के साथ, जिससे आप पहले ही परिचित हो चुके हैं, स्कूल आता है। दस साल की उम्र में वह अपनी कक्षा का बड़ा विद्यार्थी है। वह अभी केजी 2 में ही है, जहां बच्चे पहली कक्षा से पहले पढ़ना, लिखना और गिनती सीखते हैं और जिसे पास करने के बाद ही उन्हें पहली कक्षा में प्रवेश दिया जाता है। उसके शिक्षक बताते हैं कि दिमाग से वह तेज़ है और काफी जल्दी वह नए शब्द सीख लेता है और पाठ भी याद कर लेता है।
यह देखकर खुशी होती है कि पढ़ाई और भोजन के खर्च के बोझ से उन्हें बरी करके हम इन बच्चों की और उनके परिवार की न सिर्फ आर्थिक मदद कर पा रहे हैं बल्कि ऐसी शिक्षा भी दे पा रहे हैं जो भविष्य में उनके जीवन में बहुत बड़ा परिवर्तन ला सकती है!
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