खेतों में रहना – हमारे स्कूल के बच्चे -16 मई 2014

आज फिर शुक्रवार है और अपने स्कूल के विद्यार्थियों का परिचय आपसे कराने का दिन। आज बारी है, दो लड़कियों की, जो वृन्दावन की सीमा पर, अपने खेतों में रहती हैं, जहाँ से आज भी पुराने वृन्दावन के खूबसूरत नजारों के दर्शन किए जा सकते हैं। आज हालत यह है कि सभ्यता के अतिक्रमण के चलते चप्पे-चप्पे पर घर बने हुए हैं।

लड़कियों के नाम क्रमशः बबीता और सीमा हैं। उनका एक बड़ा और एक छोटा भाई भी है। बबीता बारह और सीमा दस साल की है। उनके पिता कुल आठ भाई थे और पहले सारा परिवार वृन्दावन के एक गरीब इलाके में रहते थे, जहाँ हमारे स्कूल के और भी बच्चे भी रहते हैं। जैसे-जैसे एक-एक कर बच्चे पैदा होते गए, रहने की जगह कम पड़ती गई और जब एक कमरे में चौदह बच्चों के एक साथ रहने की नौबत आ गई, उन्होंने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया: दो भाई और एक बहन अपनी पत्नियों और बच्चों को लेकर अपने खेतों में रहने आ गए।

एक समय था जब परिवार के पास बड़े-बड़े खेत थे,रहने के लिए पर्याप्त जगह थी और यमुना के किनारे कई वर्ग-गज़ ज़मीने थीं। बबीता का पिता और चाचा उस जायदाद को अपनी पैत्रिक सम्पति समझते थे मगर फिर यमुना में बाढ़ आई और उस जायदाद को बहा ले गई। उनकी ज़मीन अब नदी का पात बन चुका है और उनके पास शहर की तरफ बहुत थोड़ी सी ज़मीन बची रह गई है।

वहाँ हर तरफ खूबसूरती बिखरी पड़ी है और वह एक रेतीली पगडंडी द्वारा शहर से जुड़ी हुई भी है। निश्चय ही, वातावरण में चारों तरफ फैला प्लास्टिक की पन्नियों और दूसरे कूड़े-करकट का प्रदूषण एक समस्या है लेकिन फिर भी उन बच्चियों के घर के आसपास काफी हरियाली मौजूद है, जो मन को मोह लेती है। लेकिन यह भी साफ़ नजर आता है कि उनके यहाँ थोड़ा सा भी अतिरिक्त धन-धान्य नहीं है। उनका घर बहुत साधारण सा है: थोड़ा हटकर कीचड़ में संडास है, घर के पास ही भैंस खड़ी रहती है और जब हम उनके यहाँ पहुंचे, दोनों बच्चियाँ अपने खेतों से दौड़ती हुई हमारे पास आईं। दोनों खेतों में लगे पानी के पाइपों से निकलते पानी में नहा रही थीं। दोनों लड़कियों के कपड़े फटे हुए नज़र आ रहे थे।

बबीता और सीमा का पिता वृन्दावन के एक होटल के खरीदी विभाग में काम करता है और 80 डालर यानी लगभग 5000 रुपए मासिक कमाता है। इस आमदनी का बहुत बड़ा हिस्सा बच्चों की स्कूल फीस, किताबों, दोनों लड़कों, जिन्हें दूसरे स्कूलों में भर्ती कराया गया है, के टिफिन आदि पर ही खर्च हो जाता है। प्रतीत होता है कि लड़कों की पढ़ाई पर किए जाने वाले खर्च को वे ज़्यादा महत्व नहीं देते लेकिन हम उनकी बच्चियों को मुफ्त पढ़ाते हैं। यह एक पारंपरिक विचार है कि लड़कियों को विवाह करके सिर्फ घरेलू काम करना है इसलिए उन्हें पढ़ाने की कोई आवश्यकता नहीं है, उनके यहाँ भी जड़ जमाए बैठा हुआ है।

लेकिन लड़कियों को हमारे स्कूल में पढ़ना बहुत अच्छा लगता है। हमें आशा है कि भविष्य में अपने लिए वे परिवार द्वारा तय रास्ते से अलग कोई रास्ता चुनेंगीं। वे अपने चाचा के बच्चों के साथ स्कूल आती हैं। वे अच्छे विद्यार्थी हैं और दोनों हमेशा एक साथ रहती हैं इसलिए दोनों के बीच भेद करना मुश्किल हो जाता है!

अगर आप इन बच्चों जैसे ही दूसरे बच्चों की मदद करना चाहते हैं और किसी बच्चे को प्रायोजित करते हैं या स्कूल के बच्चों के एक दिन के भोजन का खर्च वहन करते हैं तो हमें बहुत ख़ुशी होगी।

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