जिनके लिए पानी का संघर्ष ही जीवन-संघर्ष बन गया है – हमारे स्कूल के बच्चे- 11 अक्तूबर 2013

आज फिर शुक्रवार है और समय है आपको हमारे स्कूल के कुछ विद्यार्थियों से मिलवाने का। आज मैं अभिषेक और वरुण के परिवार के साथ हमारी मुलाक़ात का ब्योरा देना चाहता हूँ। 13 वर्षीय अभिषेक और 12 वर्षीय वरुण शुरू से हमारे स्कूल आ रहे हैं, यानी छह साल पहले, 2007 से, जब हमारे स्कूल का शुभारंभ हुआ था। वे अब क्रमशः कक्षा पाँच और चार में पढ़ रहे हैं और हर वर्ष स्कूल के सबसे प्रतिभाशाली विद्यार्थियों के रूप में चुने जाते हैं। साल दर साल स्कूल के सबसे प्रातिभाशाली छात्रों में गिने जाते हैं।

कई साल पहले, जब अपना छोटा सा गाँव छोड़कर उनका परिवार वृन्दावन आया था तब बच्चे छोटे ही थे। पहले वे एक किराए के घर में रहते थे मगर फिर उन्होंने बचत करना शुरू किया और लोन लेकर अपने लिए एक घर खरीद लिया। स्वाभाविक ही हर माह उन्हें लोन की किश्तें चुकानी पड़ती हैं और उससे उनका मासिक बजट गड़बड़ा जाता है लेकिन सिर पर अपने घर की छत होना ही उन्हें उल्लास और गर्व से भर देता है। लेकिन नए घर में उनकी सबसे बड़ी चिंता पानी की समस्या है!

जहां वे रहते हैं, उस इलाके में दिन भर में सिर्फ दो घंटे के लिए पानी की आपूर्ति होती है। इसलिए पाइप और नल वगैरह होने के बावजूद सिर्फ दिन में दो बार एक-एक घंटे के लिए उसका उपयोग हो पाता है। जैसे ही नल आता है सारा परिवार अपनी बाल्टियाँ और दूसरे बर्तन लेकर उस बेशकीमती पानी (पदार्थ) को भरना शुरू कर देते हैं क्योंकि इसी पानी से उन्हें दिन भर काम चलाना है: नहाना-धोना है, कपड़े साफ करने हैं, घर की सफाई करनी है, खाना बनाना है और पीने के लिए भी रखना है! फिर कहने के लिए पानी दो घंटे आता है मगर उसका प्रवाह पूरे समय एक सा नहीं होता। शुरू में तो वह तेज़ होता है मगर आसपास के पैसे वाले लोगों ने सीधे आपूर्ति-लाइन में अपने पंप जोड़ रखे हैं और जैसे ही वे लोग पंप चलाते हैं, इनके यहाँ पानी का प्रवाह आधे से भी कम रह जाता है और उन्हें बहुत कम पानी मिल पाता है। बड़े लोग अपने बड़े-बड़े टैंक भरते रहते हैं और इनके नल की हालत यह होती है कि कई बार बूंद-बूंद पानी टपकता रहता है और कई बार वह भी बंद हो जाता है।

जब हम वहाँ पहुंचे, हमने देखा कि वे तब तक सिर्फ तीन बाल्टियाँ भर सके हैं और तभी उन्होंने हमें बताया कि दो दिन पहले तो पानी ही नहीं आया था। जब पानी नहीं आता तो वे क्या करते हैं? तब उन्हें आधा किलोमीटर दूर स्थित हैंड-पंप से बाल्टियाँ भरकर लाना पड़ता है। स्वाभाविक ही दोनों बच्चे इस काम में अपनी माँ की मदद करते हैं। पिताजी को अपने काम पर पहुंचना होता है।

बच्चों के पिताजी एक स्थानीय डॉक्टर के यहाँ सहायक का काम करते हैं, जिसमें मरीजों से फीस वसूल करने से लेकर डॉक्टर की पर्चियाँ और दवाइयाँ मरीजों तक पहुंचाना शामिल है। आप समझ सकते हैं कि इस तरह के काम से उन्हें कितनी आमदनी होती होगी: 3000 रुपए यानी लगभग 50 अमरीकी डॉलर, माहवार। इतनी आमदनी में दो बच्चों के परिवार का खर्च ठीक तरह से चल पाना नामुमकिन है और इसलिए बच्चों की पढ़ाई का जिम्मा उन्होंने हमें दे रखा है।

अभिषेक और वरुण हमारे स्कूल के सबसे अच्छे विद्यार्थियों में शामिल हैं। हर साल परीक्षा में उनके बहुत अच्छे नंबर आते हैं और वे बहुत महत्वाकांक्षी भी हैं। वरुण इंजीनियर बनना चाहता है और अभिषेक पुलिस इंस्पेक्टर-जी हाँ, एक ईमानदार पुलिस अधिकारी, जो ज़रूरतमन्द लोगों की सहायता करेगा और देश को बेहतर बनाने में अपनी भूमिका निभाएगा।

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