दो बच्चों को पीछे छोड़कर काम खोजने निकल पड़ना – हमारे स्कूल के बच्चे – 13 मार्च 2015

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

आज रमोना और पूर्णेन्दु हमारे स्कूल के सबसे छोटे लड़के से मिलने उसके घर गए थे। उसका नाम विपुल है और वह पाँच साल का है।

विपुल को लेकर जब उसकी माँ हमारे यहाँ उसे भर्ती कराने आई थी तब हमने सोचा था कि उसे भर्ती करने से हम मना कर देंगे क्योंकि उसकी उम्र बहुत कम थी। आम तौर पर हम पाँच साल से छोटे बच्चों को नहीं लेते क्योंकि हम समझते हैं कि ये साल बड़े कीमती होते है और यह उम्र खेलने-कूदने की होती है न कि कक्षा में बैठने की। लेकिन घर में अपनी माँ से वह पहले ही काफी कुछ लिखना-पढ़ना सीख चुका था और हमारा विचार जानकर बेहद उदास नज़र आ रहा था इसलिए हमने अपवाद स्वरूप उसे भर्ती करने का मन बना लिया। और यह बड़ा अच्छा निर्णय सिद्ध हुआ।

विपुल की कक्षा-अध्यापिका बताती है कि सब बच्चों में वह सबसे ज़्यादा मेहनती है-और हालाँकि उसकी माँ खुद सिर्फ तीसरी कक्षा तक पढ़ी है, वह बच्चे को घर में पढ़ाने की पूरी-पूरी कोशिश करती है और उसके गृहकार्य में भी उसकी मदद करती है।

अपने माता-पिता के साथ विपुल अकेला रहता है मगर वह उनकी अकेली संतान नहीं है। एक उसका सौतेला भाई भी है और एक बहन भी। उसके पिता की यह दूसरी पत्नी है। पहली पत्नी का देहांत हो चुका है। विपुल की माँ ने विपुल से पहले एक लड़की को भी जन्म दिया था और उसके पाँच साल बाद विपुल पैदा हुआ। जिस साल वह पैदा हुआ था, उसी साल उन्होंने पश्चिम बंगाल का अपना घर-गाँव छोड़कर वृन्दावन आने का निर्णय लिया था क्योंकि वे सोचते थे कि यहाँ विपुल के पिता को आसानी से काम मिल जाएगा।

लेकिन यह सम्भव नहीं हो पाया। वह कभी स्कूल नहीं गया था और न ही किसी व्यवसाय या हुनर की किसी प्रकार की कोई ट्रेनिंग ली थी, लिहाजा उसके पास काम के ज़्यादा विकल्प नहीं थे। उसने रिक्शा चलाना शुरू किया मगर इस काम में भी वह असफल रहा और अब विभिन्न निर्माण-स्थलों में रोजंदारी पर मजदूरी करता है। जब उसके पास काम होता है तब वह रोज़ाना 250 रुपए यानी लगभग 4 डॉलर कमाता है-लेकिन, स्वाभाविक ही काम रोज़ उपलब्ध नहीं होता।

लेकिन बावजूद इसके वे सोचते हैं कि बंगाल की तुलना में यहाँ उनकी स्थिति बेहतर है और भविष्य में भी वृन्दावन में रहना ही उनके लिए श्रेयस्कर होगा। उनका एकमात्र दुःख यह है कि उनके दोनों बच्चे, एक किशोर-वय लड़का और दस साल की लड़की पश्चिम बंगाल में पीछे छूट गए हैं! साल में एक बार वे उनकी खोज-खबर लेने वहाँ जाते हैं।

दो साल पहले विपुल के माता-पिता ने एक ज़मीन का टुकड़ा खरीदने का फैसला किया। यमुना किनारे एक छोटी सी जगह, जिसके क़र्ज़ की किश्त लगभग 1000 रुपए, यानी 15 डॉलर, वे हर माह चुकाते हैं। वे सब वहाँ रहने लगे हैं मगर अभी कई साल उन्हें क़र्ज़ चुकता करने में लगेंगे और तभी वह घर वास्तव में उनका कहा जाएगा। वह एक छोटे से कमरे वाला घर है, जिसमें हर साल बाढ़ का पानी अंदर आ जाता है लेकिन उन्हें ख़ुशी है कि कम से कम उनके पास अपना घर तो है। इसके अलावा, दूध देने वाली दो गाएँ भी उनके पास हैं।

बीच-बीच में कभी-कभी क़र्ज़ की किश्त भरने के लिए उनके पास पैसे नहीं होते। माँ की सबसे बड़ी चिंता यह थी: बच्चे के स्कूल की फीस भी वे नियमित अदा नहीं कर पाएँगे! और इसलिए हमारे स्कूल में उसे भर्ती कराके वे बहुत खुश हैं, भले ही उसे काफी दूर पैदल चलकर आना पड़ता है! वे आश्रम से बहुत दूर रहते हैं और हालांकि उस तरफ हमारी स्कूल बस भी जाती है मगर फिर भी सड़क तक आने के लिए बच्चे को छोटा सा रेतीला रास्ता और कुछ सँकरी गलियाँ पार करनी पड़ती हैं, जहाँ से सिर्फ एक मोटर साइकिल गुज़रने की गुंजाइश होती है। इन सब दिक्कतों को हँसी-ख़ुशी पार करते हुए वह रोज़ नियमित स्कूल आता है-और हमें ख़ुशी है कि हमारे स्कूल की मदद से इस समझदार और मेहनती बच्चे का भविष्य अवश्य ही बहुत उज्ज्वल होगा!

किसी एक बच्चे को या बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करके आप भी विपुल जैसे दूसरे बच्चों की मदद कर सकते हैं!