पिता की बीमारी के चलते स्कूल से निकाली गई – हमारे स्कूल के बच्चे – 17 जुलाई 2015

परोपकार

आज मैं आपका परिचय हमारे स्कूल में भर्ती हुई कुछ नई लड़कियों में से एक, गौरी से करवाना चाहता हूँ। वह आठ साल उम्र की है।

गौरी तीन साल की उम्र में अपने परिवार के साथ वृंदावन आई थी। वे अपने दादा-दादी के पुश्तैनी गाँव में रहते थे, जहाँ से वृंदावन पहुँचने में बस से लगभग एक घंटा लगता है। उसका दादा मानसिक रूप से अस्वस्थ है और इस कारण परिवार को अनगिनत कठिनाइयों का सामना करना पड़ा: उसने अपने बड़े-बड़े खेत बहुत सस्ते में बेच डाले और उसके बेटे को दूसरों के खेतों में मजदूरी करके किसी तरह गुज़ारा करना पड़ा। पैसे कमाने के लिए कभी-कभी कोई दूसरा काम भी।

गौरी के पिता ने ड्राईवर बनने का फैसला किया। आम तौर पर वह ट्रक चलाता है लेकिन जब ज़रूरत होती है, कार भी। लेकिन वह किसी एक कंपनी के लिए काम नहीं करता और इसलिए काम ढूँढ़ने के लिए उसे हर वक़्त चौकन्ना रहना पड़ता है। कभी-कभी महीनों उसके पास कोई काम नहीं होता- जैसे, जब हम उनसे मिलने उनके घर गए थे, तब। उसकी पत्नी ने बताया था कि वह दो माह से घर में बैठा है क्योंकि कोई काम नहीं मिल रहा है! स्वाभाविक ही, परिवार के लिए इसका अर्थ यह है कि आमदनी कुछ नहीं है इसलिए पिछले महीनों की जो थोड़ी-बहुत जमा-पूंजी है, उसी में से खर्च चलाना है।

पिछले साल भी ऐसा ही हुआ था कि बीमारी के चलते गौरी का पिता पाँच माह तक कोई काम नहीं कर पाया और गौरी के एक निजी स्कूल की मामूली फीस अदा करना भी असंभव ही गया। जब तक गौरी की माँ फीस लेकर नहीं आती थी, वे उसे स्कूल में घुसने नहीं देते थे। और इस तरह अंत में स्कूल ने उसका नाम काट दिया और उसका पढ़ाई छूट गई। तब लगभग एक साल तक गौरी स्कूल नहीं जा सकी।

माँ ने उसे और उसकी 6 साल की दूसरी बहन को भी एक चैरिटी स्कूल में भर्ती कराने की कोशिश की लेकिन वहाँ पर्याप्त सीटें उपलब्ध नहीं थीं और उन्होंने किसी एक बच्चे को ही भर्ती करना मंजूर किया। इस तरह गौरी की छोटी बहन उस स्कूल में पढ़ने जाती है। गौरी, इस बीच, घर में बैठी रही और माँ के घरेलू कामों में और चार साल और एक साल के छोटे भाइयों की देखभाल में हाथ बँटाती रही।

काम की उपलब्धता के अनुसार गौरी का पिता लगभग 4 से 5 हजार रुपए यानी 60 से 80 डॉलर प्रतिमाह कमा लेता है-और जैसा कि मैंने पहले बताया, कभी-कभी कुछ भी नहीं। इसी बात ने परिवार को सरकार की योजना के लाभ का हकदार बना दिया- वृंदावन में ही चैरिटी फ्लैटों के एक विशाल कॉम्प्लेक्स में एक फ्लैट का हकदार। दो कमरे और एक बाथरूम वाले इस फ्लैट के लिए उस परिवार को भी चुन लिया गया। अब वे वहाँ रह सकते हैं, वह उनका अपना है, पूरी तरह मुफ्त!

स्वाभाविक ही, यह एक बहुत बड़ा आसरा है क्योंकि उन्हें अब घर-किराया भी नहीं देना पड़ता और किसी ऋण की किश्त भी अदा नहीं करनी पड़ती। गौरी की माँ ने भी सड़क के किनारे लकड़ी के पटिए की एक छोटी सी दुकान डालकर कुछ अतिरिक्त पैसे कमाने की कोशिश की थी। लेकिन वे आर्थिक परेशानी में आ गए और बाद में उनके लिए माल खरीदना तक मुमकिन न रहा- लिहाजा एक दिन उनके पास बेचने के लिए कुछ भी न रहा और वह काम उसे छोड़ना पड़ा। उसे इस बात का बेहद दुख है कि वह इतना भी न कमा सकी कि अपनी बड़ी बच्ची को स्कूल भेज सके।

लेकिन अब उन्हें चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं है! गौरी अब हमारे स्कूल पढ़ने आती है। उसने पढ़ना-लिखना शुरू कर दिया है। वह हमारे स्कूल की एक अधिक उम्र वाली बच्ची है और दूसरे, छोटे बच्चों की हर काम में बहुत मदद करती है, इसमें उसे बड़ा मज़ा आता है!

आप भी गौरी जैसे बच्चों की मदद कर सकते हैं! किसी एक बच्चे को या बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करें। शुक्रिया!

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