आज मैं आपका परिचय हमारे स्कूल में चार साल से पढ़ रही दो लड़कियों, सरिता और कविता, से करवाना चाहता हूँ। आपने हमारे स्कूल के बच्चों के चित्रों में कभी न कभी कविता को अवश्य देखा होगा-उसके बाल अपने सहपाठियों और स्कूल के दूसरे बच्चों के बालों की तरह काले नहीं है बल्कि हल्के भूरे हैं। कभी न कभी उसके जीन में हल्के रंग की यह मूलभूत कोडिंग हुई होगी।
लेकिन इसके सिवा दोनों लड़कियाँ अपनी कक्षा की दूसरी लड़कियों जैसी ही हैं: वे स्कूल जाना पसंद करती हैं, भले ही पढ़ने-लिखने में वे अक्सर उतना उत्साह नहीं दिखातीं, जितना उनकी शिक्षिकाएँ उनसे अपेक्षा रखती हैं। उनमें से ज़्यादा महत्वाकांक्षी, कविता अब चौथी कक्षा में पढ़ेगी जबकि सरिता को पहले एक कक्षा में दोबारा पढ़ना पड़ा था और पिछले साल ही वह दूसरी कक्षा पास कर सकी है। वे अपनी सहेलियों के साथ गप्पबाज़ी करना पसंद करती हैं और अपने अवकाश के समय में खेल खेलती हैं। और हमारे स्कूल के दूसरे सब बच्चों की तरह वे भी गरीब एक परिवार से आई हैं, जिसे संघर्ष करते हुए किसी तरह गुज़ारा करना पड़ता है।
सरिता और कविता का पिता बैलगाड़ी चलाकर पैसे कमाता है। वह अपनी बैलगाड़ी में रेत, सीमेंट और ईंटें ढोकर निर्माण स्थलों तक पहुँचाता है, जोकि दैनिक मजदूरी वाला काम है और हालाँकि पिछले दिनों उसके बहुत से ठेकेदारों से सम्बन्ध हो गए हैं मगर फिर भी रोज़ काम मिल ही जाए, सुनिश्चित नहीं होता: उसे उनके पास जाना होता है, पता करना पड़ता है और अपने मौके का इंतज़ार करना पड़ता है। इतना संघर्ष करने के बाद वह सिर्फ 80 $ यानी लगभग 5000 ₹ प्रतिमाह ही कमा पाता है- कभी कुछ ज़्यादा तो कई बार इससे भी कम।
इतने पैसे में वह अपना, पत्नी का और अपने चार बाल-बच्चों का पेट पालता है। कविता और सरिता का एक बड़ा भाई और एक छोटी बहन भी है, जिनके साथ वे खेलना पसंद करते हैं। अधिकतर वे सड़क पर खेलते रहते हैं क्योंकि उनके घर में बहुत अँधेरा होता है और उनके घर का मुख्य कमरा सड़क की सतह से कम से कम दो मीटर नीचे है। यानी घर बहुत पुराना है और जब उसे बनवाया गया था तब सड़क उतनी ही नीची रही होगी।
दरअसल, यह घर सरिता की माँ के भाई का है। उसकी माँ बताती है कि उसके माँ-बाप के मरने के बाद उसका कोई सहारा नहीं बचा था और वह अपने अविवाहित भाई के पास रहने आ गई थी। माँ-बाप के मरने के बाद संपत्ति भाई को मिली और उसके विवाह के समय आधा हिस्सा दहेज़ के रूप में उसे दे दिया गया था।
घर के सबसे निचले कमरे में सीढियाँ उतरकर जाना पड़ता है और परिवार के सातों सदस्य ज़्यादातर रात को यहीं सोते हैं। कभी-कभी वे एक दूसरे कमरे में भी चले जाते हैं लेकिन वास्तव में उसमें सिर्फ तीन दीवारें हैं। उसकी छत भी टीन की है और वहां से बाहरी कमरे में जाने के लिए एक दरवाज़ा खुलता है। यह बाहरी कमरा बैल रखने के काम आता है, जहाँ नांद में रखे खली-चारे को खाकर वह रात भर खड़े-खड़े जुगाली करता रहता है।
स्वाभाविक ही उनका घर बदबू से भरा हुआ है और चारों तरफ अनगिनत मक्खियाँ भिनभिनाती रहती हैं-लेकिन इसके बावजूद वे अपने बैल को बाहर रखने के बारे में सोच भी नहीं सकते क्योंकि बाहर उसके चोरी हो जाने का डर है। दिन के समय, जब बैल लड़कियों के पिता के साथ काम पर नहीं गया होता, बैल को बाहर सूरज की खुली रोशनी में छोड़ दिया जाता है।
यह सब हमें लड़कियों की माँ ने बताया हालाँकि बताते हुए वह अपनी हालत पर लगातार दुखी होती रही। हम भी जानते हैं कि अपने पति के साथ उसका अक्सर लड़ाई-झगड़ा होता रहता है और वह उससे अलग होना चाहती है बल्कि कई बार तलाक तक लेने का विचार करती रहती है। हालाँकि यह एक समस्याग्रस्त संबंध है मगर फिलहाल तो वे साथ ही रह रहे हैं।
अगर आप इस परिस्थिति में रह रहे बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए किए जा रहे हमारे प्रयासों में सहभागी होना चाहते हैं तो आप एक बच्चे को या स्कूल के सभी बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करके ऐसा कर सकते हैं। चाहें तो आप चंदे के रूप में अपना सहयोग हम तक पहुँचा सकते हैं।
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