काम-धंधे की अनिश्चितता हो तो आप अपने बच्चे को स्कूल नहीं भेज सकते – हमारे स्कूल के बच्चे – 15 मई 2015

परोपकार

आज मैं एक बार फिर अपने स्कूल के एक बच्चे से आपको मिलवाना चाहता हूँ। वास्तव में अभी उसने हमारे स्कूल में एक दिन भी नहीं बिताया है क्योंकि वह इस साल नए सत्र के लिए भर्ती किया गया सबसे पहला बच्चा है। उसका नाम अमरनाथ है और वह सात साल का है।

जब अमरनाथ की माँ गर्भवती थी, उसका परिवार राजस्थान के एक गाँव से यहाँ, वृन्दावन आ गया था। अमरनाथ के दादा-दादी काम के सिलसिले में पहले ही यहाँ आ चुके थे और उसका पिता अपने खेत में काम करने के लिए गाँव में ही रहता था। क्योंकि वे तीन भाई हैं और खेत छोटा इसलिए इतनी पैदावार नहीं हो पाती कि तीनों परिवारों में सबका पेट भर सके। लेकिन अमरनाथ के पिता ने अपने माता-पिता या अपने बड़े भाई का, जो वृन्दावन में काम करते थे, अनुसरण नहीं किया और अपने पारिवारिक गुरु के आश्रम में चला गया।

अमरनाथ के माता-पिता मिल-जुलकर आश्रम में कई साल काम करते रहे। वे वहीं रहते थे और जब कि अमरनाथ की माँ भोजन पकाने में सहायता करती थी, उसका पिता विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान कार्यक्रमों में सहायक के रूप में काम करता था और मंत्रोच्चार और पूजा-अर्चना के दूसरे कामों में मुख्य पुजारी की मदद करता था। वे कुल 5000 रुपए यानी लगभग 80 डॉलर माहवार कमाते थे और इसके अलावा उन्हें रहने-खाने की सुविधा भी वहाँ मिली हुई थी, जिसके चलते वे अपने बेटे को पास ही स्थित एक निजी स्कूल में पढ़ा पा रहे थे, जहाँ 650 रुपए मासिक फीस अदा करनी होती थी और स्कूल की वर्दी, किताब-कापियों और परीक्षा फीस का खर्च अतिरिक्त लगा करता था।

लगभग एक साल पहले उनके गुरु ने उन पर इतनी उदारता दिखाई कि उन्हें एक प्लॉट उपहार स्वरूप भेंट कर दिया। ज़मीन का यह टुकड़ा वृन्दावन के बहुत बाहर, एक गहरे गढ़े में स्थित था, जिसे भरकर उस पर एक कमरा, रसोई और बाथरूम वाला मकान बनवाने में उन्हें काफी मशक्कत करनी पड़ी। बहरहाल, अभी वे उसी मकान में रहते हैं। वे वहाँ रहे आते मगर अचानक उनके सामने एक बड़ी समस्या खड़ी हो गई है: उन्हें आश्रम से निकाल दिया गया है-उस आश्रम से, जहाँ वे इतने साल से रह रहे थे और काम कर रहे थे!

अब उनके पास नियमित आमदनी का कोई जरिया नहीं है। एक सहायक पुजारी के रूप में अमरनाथ का पिता कभी-कभार काम पा जाता है मगर इतने काम से उनका मासिक खर्च चलना बहुत मुश्किल होता है। दरअसल वृन्दावन में बड़ी संख्या में लोग इसी व्यवसाय में लगे हुए हैं लिहाजा नियमित काम मिलना लगभग असंभव सा है! दूसरी तरफ उसका भाई काफी अलग, कुछ बेहतर स्थिति में है-उसके पास एक दुकान है और एक मकान भी है, जिसके कुछ कमरे उसने किराए पर उठा रखे हैं। लेकिन अमरनाथ के पिता के पास सिर्फ वही है, जो उसने अतीत में किया और सीखा है। उसे कभी-कभार काम मिल जाता है-लेकिन पहले जिस तरह वह अमरनाथ की स्कूल फीस भर पाता था, अब नहीं भर सकता! यहाँ तक कि कभी-कभी उसके और उसकी डेढ़ वर्षीय बहन के भोजन, कपड़े-लत्ते और दवा इत्यादि की व्यवस्था करने में भी उसके सामने बड़ी मुश्किलें पेश आती है।

इसलिए उसके माता-पिता हमारे पास आए और अमरनाथ को अगले शिक्षा-सत्र के लिए हमारे स्कूल में भर्ती कर गए। इस प्रकार वे जानते हैं कि अब उनका बेटा पढ़ाई-लिखाई करके अपना बेहतर भविष्य निर्मित कर सकेगा!

अमरनाथ जैसे बच्चों की आप भी मदद कर सकते हैं! किसी एक बच्चे को या स्कूल के बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करें!

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