गरीब संयुक्त परिवार दर्शाते हैं कि रुपया ही सब कुछ नहीं होता – हमारे स्कूल के बच्चे 22 नवंबर 2013

परोपकार

आज आप हमारे स्कूल की दो लड़कियों, राधिका और शकुन्तला और उनके परिवार के बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे। यह एक बड़ा परिवार है-और कोई भी उनसे मिलकर समझ सकता है कि सुखी और संतुष्ट जीवन जीने के लिए पैसा ही सब कुछ नहीं है!

दस साल की राधिका अपने सहोदरों सबसे बड़ी है। आठ साल की शकुंतला दूसरे नंबर पर है और उसके बाद एक लड़की तीन साल की और एक साल का भाई है। जब हम वहाँ पहुंचे, भाई बारी-बारी से बहन और माँ की गोद में खेल रहा था।

लड़कियों का पिता बिजली का काम करता है और धार्मिक आयोजनों में बिजली की अस्थाई फिटिंग करता है। जब कोई प्रवचनकार वृन्दावन के आसपास कहीं प्रवचन करने जाता है तो वह भी उसके साथ चला जाता है और बिजली, माइक्रोफोन और स्पीकर आदि की व्यवस्था देखता है। इस तरह वह काम के सिलसिले में अक्सर आठ-दस दिन के लिए बाहर ही रहता है। जब वह वापस घर आता है तो उसकी जेब में आम तौर पर 3000 रुपए होते हैं, जो लगभग 50 यू एस डालर के बराबर रकम होती है। भाग्य अच्छा हुआ तो माह में दो या तीन बार उसे बाहर जाने का मौका मिल जाता है। लेकिन इसके विपरीत, साल में कई माह ऐसे भी होते हैं, जब उसके पास कोई काम नहीं होता।

जब पैसा नहीं होता तो उसे अपने सम्मिलित परिवार पर निर्भर रहना पड़ता है। उनके घर में निवास करने वाला यह छह सदस्यों वाला एकमात्र परिवार ही नहीं है। लड़कियों के पिता का बड़ा भाई, उसकी पत्नी और तीन बच्चे और बच्चों की दादी भी वहीं साथ में रहते हैं। वे दो अलग-अलग कमरों में सोते हैं, एक रसोई में खाना पकाते हैं और दोनों परिवार कमरों के सामने वाली बैठक को साझा करते हैं। एक स्नानघर है और एक संडास। स्वयं की ज़मीन पर बारह लोगों के लिए इतनी सी रहने की जगह उपलब्ध है।

इसके बावजूद वे सभी प्रसन्न हैं। पड़ोसी बच्चों या आवारा जानवरों (कुत्तों) के साथ बच्चों को सड़क पर खेलना पसंद है। औरतें सम्मिलित रूप से रसोई और घर का दूसरा काम संभालती हैं और परिवार के सारे सदस्य हँसते-खेलते और हंसी-मज़ाक करते हुए समय व्यतीत करते है। ऐसा भी समय आता है जब आर्थिक तंगी के चलते गुज़ारा मुश्किल हो जाता है और तब दोनों एक दूसरे की सहायता करते हुए किसी तरह मिल-बांटकर काम चलाते हैं। कई बार दोनों परिवारों को खाने के लाले पड़ जाते हैं। लेकिन: उन्हें एक-दूसरे का सहारा होता है और ऐसी परिस्थिति में भी यही बात उन्हें खुश भी रखती है।

स्कूल में भी दोनों बहनें बड़ी खुश रहती हैं। दोनों स्वभाव से ही हंसमुख हैं। पढ़ाई में वे बहुत अच्छी नहीं हैं मगर परीक्षा में बहुत खराब नंबर भी नहीं आते। उनके बहुत से दोस्त हैं-और उन्हें सबके साथ हिल-मिलकर खेलते देखना बहुत सुखद लगता है। यह अहसास भी हमें खुशी से भर देता है कि हमारे स्कूल में शिक्षा मुफ्त होने के कारण दोनों अपनी पढ़ाई पूरी कर पाएँगी और उनका भविष्य उतना दुखद नहीं होगा!

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