पढाई पर किया गया खर्च बेकार गया – हमारे स्कूल के बच्चे – 3 जनवरी 2014

परोपकार

आज मैं आपको एक ऐसे लड़के से मिलवाऊँगा, जिसकी चचेरी बहनों से आप पहले ही मिल चुके हैं। जब हम अनुष्का, दिव्यान्शी और उज्ज्वला से मिलने गए थे तब हमें पता चला था कि वे सभी 33 सदस्यों के विशाल परिवार में रहती हैं-और उनका चचेरा भाई, राकेश भी हमारे स्कूल में ही पढ़ता है!

राकेश दस साल का है और अपने चार भाइयों में सबसे छोटा है। उसका पिता अपने छः भाइयों में से एक है, जो आगे चलकर उस संपत्ति के संयुक्त मालिक बनेंगे, जिस पर छः कमरों का यह मकान बना है, जहां वे सब निवास करते हैं। इस तरह छः सदस्यों के उनके परिवार के पास एक कमरा है। कमरे में, जहां मुख्य रूप से बिस्तर भर है, सभी एक साथ सोते हैं। कुछ स्थान कपड़े आदि सामान रखने के लिए है और बस। ऐसा नहीं है कि उनके पास रखने के लिए ढेर सारा सामान है कि उसे रखने की समस्या हो-संयुक्त परिवार, वैसे भी, बहुत सा सामान आपस में साझा करते हैं इसलिए प्रत्येक परिवार को अपना अतिरिक्त सामान रखने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।

लेकिन जिसकी उनको सबसे ज़्यादा ज़रूरत है वह यह है कि हर पिता के पास पर्याप्त नियमित आमदनी का कोई जरिया हो! राकेश का पिता एक गोशाला में काम करता है और हर माह 3500 रुपए कमाता है, जोकि लगभग 55 डालर प्रतिमाह होता है। वह गायों की देखभाल करता है, उन्हें खाना खिलाता है, चराने ले जाता है, गोशाला की सफाई करता है और दिन में दो बार उनका दूध भी दुहता है। यह बड़ा कठिन काम है लेकिन अपने रिश्तेदारों और परिचितों की तरह किसी फैक्ट्री में काम करने की तुलना में वह जीवित मवेशियों का काम करने में खुशी महसूस करता है। और कभी कभी उनके यहाँ आने वाले तीर्थयात्री, जो गाय को बहुत पवित्र मानते हैं, उसे गोमाता की सेवा करने के एवज़ में कुछ न कुछ बख्शीश देते रहते हैं। तीर्थयात्रियों की नज़र में यह एक पुण्य का काम है और उसके लिए ज़िंदा रहने के लिए किया जाने वाला आवश्यक काम।

राकेश का पिता परिवार के गाय-भैंसों की भी देख-रेख करता है, जिनसे संयुक्त परिवार के लिए दूध प्राप्त होता हैं। वह अपने बेटों को भी यह काम सिखाता है लेकिन साथ ही वह उन्हें स्कूल भी भेजता है, इस आशा में कि एक दिन पढ़-लिखकर वे उससे ज़्यादा कमा पाएंगे!

अपनी थोड़ी सी आमदनी में वह अपने बच्चों को उसी स्कूल में भेज सकता है, जहां फीस कम लगती है। तीन बच्चों की फीस अदा करने के बाद अपने सबसे छोटे लड़के के लिए उसके पास कुछ नहीं बचता था। फिर भी उसे बहुत ही कम फीस वाला एक स्कूल मिल ही गया और राकेश उस स्कूल में पढ़ने लगा-लेकिन दो साल वहाँ पढ़ने के बाद एक दिन उसके अभिभावकों ने नोटिस किया किया कि इन दो सालों में उसने कुछ भी नहीं सीखा है! उस स्कूल की पढ़ाई का स्तर इतना खराब था कि उतना तो वह अपने भाइयों से ही सीख सकता था!

इस तरह उन्होंने राकेश के चाचा-चाची की सलाह मानकर, जिनकी लड़कियां हमारे स्कूल में पढ़ती थीं और काफी तरक्की कर रही थीं, राकेश को इस साल से हमारे स्कूल भेजना शुरू कर दिया। वह दस साल का है और केजी में भर्ती हुआ है। लेकिन वह सबसे बड़ा विद्यार्थी नहीं है और इसलिए अपनी कक्षा में, जहां हर उम्र के बच्चे पढ़ते हैं, उसे अच्छा लगता है। और उसके शिक्षक पुष्टि करते हैं: वह तेज़ी के साथ सीख रहा है।

हमें खुशी है कि इन बच्चों को मुफ्त शिक्षा और भोजन प्रदान करके हम इस विशाल परिवार की थोड़ी-बहुत मदद कर पा रहे हैं। अगर आप हमारे प्रयासों में सहभागी होना चाहते हैं तो एक बच्चे को प्रायोजित करके या बच्चों के एक दिन के भोजन की व्यवस्था करके आप ऐसा कर सकते हैं!

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