आधे अनाथ बच्चे, जिनकी माँ को उनसे मातृवत लगाव नहीं है – हमारे स्कूल के बच्चे – 4 सितंबर 2015

आज मैं आपका परिचय दो भाइयों से करवाना चाहता हूँ, जिनके नाम गणेश और नरेश हैं और जो क्रमशः छह और पाँच साल के हैं। अप्रैल 2015 में एक मोटर साईकिल दुर्घटना में उनके पिता का देहांत हो गया और इस तरह अब उन्हें आधे अनाथ कहना अनुपयुक्त नहीं है। लेकिन इस दुर्घटना के कारण उनके जीवन में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया है क्योंकि वैसे भी वे हमेशा से अपने चाचा के साथ ही रहते आए हैं।

और उसका चाचा ही उसे स्कूल लेकर भर्ती कराने आया था। जब हम बच्चों के घर का दौरा करने निकले तो उनके चाचा के घर ही गए क्योंकि बच्चे वहीं रहते हैं। एक कमरे के किराए के अँधेरे से घर में वह अपनी दादी और दो भतीजों के साथ रहता है। दिन के समय उसका तीसरा भतीजा यानी गणेश और नरेश का तीसरा भाई, जो सिर्फ दो साल का है, अक्सर उनके पास आ जाता है और अपनी परदादी के साथ खेलता रहता है।

माँ ने उन्हें वहीं छोड़ रखा है। शुरू से विवाह को लेकर उनके परिवार में समस्याएँ थीं। बच्चों का पिता शराबी था, जिसके चलते पति-पत्नी के बीच अक्सर लड़ाई-झगड़े हुआ करते थे। पत्नी पति पर इल्ज़ाम लगती थी कि वह जो भी कमाता है, शराब में उड़ा देता है-और कभी-कभी पति और बच्चों को वृंदावन में ही छोड़कर अपने माँ-बाप के घर चली जाती थी और महीनों बाद लौटती थी। अंत में, जबकि अभी उसके दोनों बच्चे काफी छोटे ही थे, उसने वृंदावन में ही रहकर स्वयं कोई काम-धाम करने का निश्चय किया।

फिर माँ के माँ-बाप यानी बच्चों के नाना-नानी कहीं बहुत दूर रहते हैं और पिता की माँ यानी बच्चों की दादी का देहांत हो चुका था। उनके पिता का पिता यानी बच्चों का दादा कहीं और रहता है लेकिन परिवार में किसी के साथ भी उसके संबंध अच्छे नहीं हैं। इसके अलावा उसका अपना कोई निजी काम-धंधा भी है इसलिए वह बच्चों की देखभाल करने में पूरी तरह असमर्थ है। उसके बाद एक ही जगह बचती थी: पिता के भाई का यानी बच्चों के चाचा का घर, जहाँ पहले ही चाचा की दादी यानी गणेश की परदादी भी रहती थी और जिसकी देखभाल की ज़िम्मेदारी भी चाचा ही पर आयद थी।

लेकिन उसने बच्चों को अपने यहाँ रख लिया, जैसे वे उसी के सगे बच्चे हों। जब बच्चों की माँ महीनों अपने माँ-बाप के घर चली जाती है या यहीं किसी काम-धंधे के सिलसिले में बाहर रहती है तो वही बच्चों की देखभाल करता है। वह अविवाहित है और स्वाभाविक ही उसके कोई बच्चे भी नहीं हैं लेकिन चाचा होते हुए पिता की तरह अपने कर्तव्य का निर्वाह कर रहा है। अपने सीमित साधनों में जिस तरह वह भतीजों की परवरिश कर रहा है, कोई कह नहीं सकता कि वह उनका पिता नहीं है। पिछले कई सालों से माँ यह देखती रही है और इसलिए अपने देवर से किसी काम के लिए कहने में उसे कोई संकोच नहीं होता और जब वह अपने काम पर निकलती है तो उस बूढ़ी महिला को भी वह छोटे बच्चे पर नज़र रखने के काम में लगाए रखती है। ऐसा लगता है, जैसे उसके दिल में बच्चों के प्रति मातृवत लगाव ही नहीं है।

गणेश का चाचा किसी तरह घर का खर्च चलाता है। वह एक चलता-फिरता चाट का ठेला लगाता है और शहर भर घूम-घूमकर चाट-समोसे आदि नाश्ते का सामान बेचता है। उसकी मासिक आमदनी उसकी दैनिक बिक्री पर निर्भर करती है-और निश्चित ही वह इतनी नहीं होती कि दो-दो बच्चों की स्कूल फीस भर सके!

इस तरह हमारा स्कूल उन बच्चों के सामने संभावनाओं के द्वार खोलता है जो अन्यथा उनके लिए बंद थे! यहाँ वे पूरी तरह मुफ़्त शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं और ऊपर से गर्मागर्म भोजन भी।

अगर आप भी गणेश और नरेश जैसे बच्चों की मदद करना चाहते हैं तो आप किसी एक बच्चे को या बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करके हमारे चैरिटी स्कूल के सत्कार्य में अपना योगदान दे सकते हैं! हम पहले ही आपका शुक्रिया अदा करना चाहते हैं!

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