एक बच्ची, जिसका लालन-पालन निर्माण स्थलों पर हुआ – हमारे स्कूल के बच्चे – 7 अगस्त 2015

परोपकार

आज मैं आपका परिचय एक ऐसी बच्ची से करवाना चाहता हूँ, जिसे हमने सीधे दूसरी कक्षा में भर्ती किया है- उसे औपचारिक स्कूली कक्षाओं से पहले की कक्षाओं यानी के जी में पढ़ने की आवश्यकता नहीं पड़ी! ऐसे बहुत कम विद्यार्थी हमारे स्कूल में हैं, जिनमें से एक यह है: प्रिया!

प्रिया लगभग आठ साल की होगी। हम यह निश्चित रूप से इसलिए नहीं कह सकते कि उसके माता-पिता भी सिर्फ अंदाज़ से उसकी उम्र बता रहे थे। हमने उनसे जन्म प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए कहा है लेकिन जब तक हम उसे खुद देख नहीं लेते हम सिर्फ उनके अंदाज़े पर ही निर्भर हैं और मान सकते हैं कि वास्तव में वह आठ साल की ही है।

अपने माता-पिता और दो बड़े भाइयों के साथ वह एक किराए के मकान में वृन्दावन के सबसे गरीब इलाके में निवास करती है। दो कमरों वाले मकान का एक कमरा उन्होंने किराए पर लिया है, जिसका किराया, बिजली-पानी मिलाकर लगभग 1000 रुपए यानी लगभग 15 यू एस डॉलर है। यही कारण है कि वे अपने बच्चों को एक सस्ते निजी स्कूल में भी नहीं पढ़ा पा रहे हैं- जहाँ वे उन्हें पहले, पिछले साल तक, भेजते रहे थे लेकिन फिर उनकी फीस के लिए अक्सर उन्हें पड़ोसियों से उधार लेना पड़ता था!

माता-पिता, दोनों मजदूरी करते हैं। वे रोज़ काम की तलाश करने को मजबूर हैं और बताते हैं कि पिता लगभग बीस दिन ही काम पाता है और तब कुछ दिन, शायद दस दिन, माँ भी उसके साथ काम करने चली जाती है। इसके अलावा पिछले पाँच साल से सबेरे के समय एक डॉक्टर के क्लीनिक पर भी वह साफ-सफाई जैसे मामूली काम करने जाता है। स्वाभाविक ही, इतने से काम से पर्याप्त आमदनी नहीं होती लिहाजा दैनिक मजदूरी का काम लगातार मिलता रहे, इसके लिए रोज़ाना काम ढूँढ़ने के सिवा उनके पास कोई चारा नहीं है, जिससे किसी तरह बच्चों का भरण-पोषण किया जा सके।

जब माँ भी पिता के साथ काम पर चली जाती है तो बच्चे घर में अकेले रह जाते हैं। बड़े भाई तो खेलने चले जाते हैं और प्रिया घर में और अकेली हो जाती है इसलिए कभी-कभी वह भी माँ के साथ चली जाती है-और इस तरह पिछले कई साल से वह अपना काफी समय निर्माण स्थलों पर खेलते हुए गुजारती रही है, जबकि स्वाभाविक ही, माँ-बाप अपने काम में लगे होते हैं। कुछ साल वह भी स्कूल गई है लेकिन फिर, जबकि उसके भाई तो स्कूल जाते रहेंगे, उसकी माँ ने उसके लिए तय किया था कि वह स्कूल नहीं जाएगी, घर पर रहेगी। लेकिन फिर अचानक उन्हें हमारे स्कूल का पता चला।

यही बच्चे हैं, जिनके लिए हम काम करते हैं और जब आप ऐसे किसी घर में प्रवेश करते हैं तब आपको पता चलता है कि आपके प्रयासों का प्रिया जैसी लड़कियों के जीवन पर क्या असर पड़ेगा। ऐसे आड़े वक़्त में उसकी पढ़ाई रोक देना, जबकि वह हिंदी में अपना नाम लिखना जानती है लेकिन अंग्रेजी में नहीं, जबकि जोड़-घटाना कर लेती है मगर गुणा-भाग नहीं, जबकि वह सिर्फ बुनियादी शिक्षा ही प्राप्त कर पाई है, उसके साथ बहुत बड़ी ज़्यादती होती क्योंकि वह बड़ी आसानी से आगे की पढ़ाई जारी रख सकती है। वह ज्ञान की ठोस बुनियाद रख सकती है, जिससे आगे चलकर वह अपने लिए बेहतर जीवन का निर्माण कर सके।

अपने स्कूल में प्रिया को और उसके साथ उस जैसे दूसरे अनेकानेक बच्चों को पाकर, जो अन्यथा इतनी अच्छी शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकते थे, हमें ख़ुशी हो रही है! हमारे इस सत्कार्य में आप भी मदद कर सकते हैं! किसी एक बच्चे को या फिर बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करें और इन गरीब बच्चों को पढ़ने-लिखने का मौका प्रदान करें!

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