किस तरह मुफ़्त शिक्षा अभिभावकों के कंधों पर लदा आर्थिक बोझ कम कर रही है – 9 अक्टूबर 2015

परोपकार

आज मैं आपको दो लड़कों से मिलवाना चाहता हूँ: सात साल के संदीप और छह साल के लव से, जिनके पिता और नाना आश्रम के पास ही बाल काटने और दाढ़ी बनाने का कार्य करते हैं।

वे पाठक, जो हमारे आश्रम आ चुके हैं, संभवतः उनके हेयर कटिंग सेलून के सामने से अवश्य गुज़रे होंगे और देखा होगा कि एक छोटी सी, गैरेजनुमा जगह में दो कुर्सियाँ रखी हैं, जिन पर एक अधेड़ और एक युवक अपने काम में लगे हुए हैं। युवक उस उम्रदराज़ व्यक्ति का दामाद है। उनके इसी सैलून में हमारी उनसे मुलाक़ात हुई और फिर वह हमें पास ही स्थित अपने घर ले गया।

रास्ते में ही उसने बताया कि वह वृंदावन का रहने वाला नहीं है बल्कि यहाँ से कुछ दूर स्थित गाँव का रहने वाला है। शादी के बाद पत्नी उसके और उसके माता-पिता के साथ रहने गाँव आई थी, लेकिन गाँव में रोज़गार के अधिक अवसर नहीं थे इसलिए वे बिना अधिक समय गँवाए पत्नी के पिता के साथ काम करने वृंदावन आ गए। अब दोनों ने मिलकर किराए पर यह दूकान ली है। इसके अलावा बच्चों के पिता को एक कमरे और छोटी सी रसोई वाला एक घर भी किराए पर लेना पड़ा, जहाँ वह दो बच्चों और पत्नी के साथ रहता है। कहने की ज़रूरत नहीं कि माह के अंत में उनके पास भोजन, कभी-कभार कपड़े-लत्ते और दूसरे दैनिक घरेलू खर्चों के बाद अतिरिक्त ज़रूरतों के लिए कुछ भी नहीं बच पाता। मामूली आवश्यक दावा-दारू का खर्च भी उन्हें आर्थिक संकट में डाल देता है!

ऐसा ही एक संकट हमसे मुलाक़ात से तीन माह पहले सामने आया था: उनका तीसरा बच्चा, एक लड़की पैदा हुई! वे शहर के सरकारी अस्पताल गए लेकिन, हालांकि वह सस्ता था, सारा खर्च उठाने के लिए उन्हें बच्चों के नाना-नानी से काफी पैसा उधारी लेना पड़ा!

जिस कमरे को उन्होंने किराए पर लिया है, उसमें पाँच और कमरे हैं और सभी विभिन्न परिवारों को किराए पर उठे हुए हैं। हालांकि पड़ोसियों के नाते उनमें बातचीत होती है लेकिन, भले ही सामने आँगन में ही बैठे हों, चोरी के डर से सभी अपने-अपने कमरों पर ताले लगा लेते हैं।

इन पड़ोसियों में राहुल और गोपाल नाम के दो और बच्चे हैं, जो पिछले दो-तीन साल से हमारे स्कूल पढ़ने आ रहे हैं। उन्हीं से लव और संदीप के माता-पिता को हमारे स्कूल का पता चला कि यहाँ मुफ्त शिक्षा प्रदान की जाती है और ऊपर से मुफ्त भोजन भी मिलता है। फिर वे इस साल अपने बच्चों को भर्ती कराने हमारे पास आए।

तो इस तरह वे दोनों अब हमारे स्कूल में पढ़ रहे हैं। दोनों बच्चे बहुत शांत प्रकृति के हैं लेकिन फिर भी उन्होंने कुछ दोस्त बना ही लिए हैं! उन्हें स्कूल आना बहुत अच्छा लगता है-और वैसे भी उन्हें अधिक दूर नहीं आना पड़ता!

उन जैसे दूसरे बच्चों को या बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करके आप उनकी मदद कर सकते हैं। शुक्रिया!

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