कई लोगों के लिए गरीबी सबसे बड़ी त्रासदी है – हमारे स्कूल के बच्चे- 26 जुलाई 2013

परोपकार

आज शुक्रवार है और अपने स्कूल के विद्यार्थियों का आपसे परिचय कराने का दिन। हमारे स्कूल के सभी बच्चे गरीब घरों के लड़के-लड़कियां ही हैं लेकिन, जबकि पहले मैंने आपको बताया था कि सबकी अपनी एक दुखद कथा है, कुछ लोगों के लिए शायद एकमात्र त्रासदी ही यह है कि वे गरीब हैं और उनके पास बिल्कुल पैसा नहीं है। ऐसे ही दो बच्चे हैं, रिचा और उसका छोटा भाई बलदाऊ।

रिचा का परिवार वृन्दावन से 700 किलोमीटर दूर स्थित गोरखपुर का रहने वाला है। पिछले साल तक बच्चे अपने पिता को बहुत दिनों तक देख ही नहीं पाते थे। वह कई सालों से, बच्चों से दूर वृन्दावन में अकेला रहता था और यहाँ छोटे-मोटे काम करके थोड़ा बहुत कमाता था, जिससे उसके बच्चों का लालन-पालन हो पा रहा था। एक साल पहले उसने अपने परिवार को वृन्दावन लाने का निश्चय किया। उसका परिवार यानी, उसकी पत्नी, उसके दो लड़के, एक लड़की और बूढ़ी माँ।

अगर आप उनका घर देखें तो आपके लिए विश्वास करना मुश्किल हो जाएगा कि छह लोग इतनी छोटी सी जगह में भी रह सकते हैं। वह लगभग दो बाय तीन मीटर का एक छोटा सा, अंधेरा कमरा है, जिसकी दीवारे ईंटों की हैं, जिन पर प्लास्टर भी नहीं चढ़ाया गया है। बीचों-बीच एक रस्सी से परिवार के कपड़े लटक रहे हैं, एक कोने में पूजाघर है और दूसरे कोने में कुछ बर्तन रखे हुए हैं। हमने पूछा कि क्या उनके यहाँ बिजली है तो उन्होंने कहा कि हाँ, जब बिजली की सप्लाई रहती है तो एक बल्ब से सारे कमरे में उजाला हो जाता है। रिचा ने सगर्व कहा, "और पंखा भी है!" उसने एक तरफ रखे पुराने पंखे की तरफ इशारा किया।

उसका पिता ज़्यादा से ज़्यादा इतना ही मुहैया कर सकता है। कमरे का किराया 500 रुपए है, जो लगभग 10 डालर के बराबर है और उसके लिए हैसियत से ज़्यादा है क्योंकि उसकी आमदनी का कोई स्थाई जरिया नहीं है। कभी वह किसी पुजारी को उसके कर्मकांड निपटाने में मदद करता है, कभी उसका सामान ढोने में। जीवन में इतना ही वह सीख पाया है और जबकि वृन्दावन में सदा ही कहीं न कहीं, कोई न कोई कर्मकांड चलता ही रहता है, जो काम वह करता है उसे करने वाले बड़ी संख्या में हर वक़्त उपलब्ध रहते हैं। किसी महीने में सौभाग्य से उसे इस तरह के कई काम मिल जाते हैं मगर ऐसा कम ही होता है। अधिकतर होता यह है कि माह में बहुत कम ऐसे मौके आते हैं।

इसीलिए हम रिचा की माँ से बात नहीं कर पाए-उसके लायक जब भी कोई छोटा-मोटा काम मिल जाता है वह उसे लपक लेती है और कभी कभार लोगों के यहाँ खाना बनाने में सहायक के रूप में उसे काम मिलता रहता है। इस तरह वह घर की थोड़ी सी कमाई में एक छोटा सा मगर महत्वपूर्ण योगदान देती रहती है।

परिवार का एक और सदस्य गायब था: नंदन, रिचा का बड़ा भाई। पिछले साल वह हमारे स्कूल में पढ़ता था लेकिन दुर्भाग्य से हम उसे आगे पढ़ा नहीं पाए। वह दिमागी रूप से कमजोर है और अजीबोगरीब हरकतें करता है। कभी खड़ा है तो खड़ा ही रह जाएगा, कभी कमरे से बाहर निकल भागेगा। कभी-कभी दूसरे बच्चों को और शिक्षकों को मारना-पीटना शुरू कर देता था। हमारे स्कूल में इस तरह के बच्चों के लिए कोई सुविधा नहीं है और न ही हमारे शिक्षक ऐसे बच्चों से निपटने के लिए पर्याप्त प्रशिक्षित हैं इसलिए हमारे लिए उसे अपने स्कूल में रखना संभव नहीं था और दुर्भाग्य से ऐसी आवश्यकताओं के लिए आसपास कोई और स्कूल भी नहीं है। वैसे, वह खुशमिजाज बच्चा है-लेकिन स्वाभाविक ही उसके माँ-बाप सोचते हैं कि काश उनके पास कुछ अतिरिक्त पैसा होता जिससे वे उस बच्चे की और उसके सहोदरों की बेहतर देखभाल कर पाते।

सवाल है कि यह परिवार अपने बच्चों की पढ़ाई की फीस, उनके स्कूल की वर्दियाँ, किताबें-कापियाँ पेंसिल आदि का खर्च किस तरह वहन कर पाएगा। इसलिए रिचा और बलदाऊ हमारे स्कूल आते हैं, यहीं भोजन करते हैं, खेलते हैं और परिवार के बेहतर भविष्य के लिए पढ़ाई करते हैं!

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