पाकिस्तान से भागकर भारत आना, क्योंकि वहाँ हिन्दू होना खतरे से खाली नहीं – हमारे स्कूल के बच्चे – 24 अप्रैल 2015

परोपकार

आज मैं आपका परिचय एक साथ तीन बच्चों से करवाना चाहता हूँ, जिन्होंने पिछले साल से ही हमारे स्कूल में पढ़ना शुरू किया है: लक्ष्मीप्रिया, लेखराज, हालादिनी, जिनकी उम्र क्रमशः 14, 11 और 7 साल है। हमारे स्कूल के सभी दूसरे बच्चों से सिर्फ एक मामले में वे बिल्कुल अनोखे हैं: वे भारत में नहीं बल्कि पाकिस्तान में पैदा हुए हैं और उनके पास पाकिस्तानी पासपोर्ट है।

उनका परिवार पिछले साल जुलाई में हमारे पास आया था, जब वास्तव में स्कूल की भर्तियाँ बहुत समय पहले बंद हो चुकी थीं और नया सत्र शुरू हो चुका था। लेकिन जब हमने उनकी शोकगाथा सुनी तो उन्हें भर्ती करने में हमें कोई हिचकिचाहट नहीं हुई क्योंकि उन्हें वास्तव में मदद की बड़ी ज़रूरत थी। परिवार हिन्दू धर्म का अनुयायी है, लेकिन जब सन 1947 में यह विशाल देश दो टुकड़ों में बंटने लगा तो उनके पूर्वजों ने पाकिस्तान वाले हिस्से को न छोड़ने का निर्णय लिया। वे उसी इस्लामी हिस्से में रहे आए क्योंकि उनके छोटे से कस्बे में उनके पास एक निजी हिन्दू मंदिर था।

लेखराज के माता-पिता उसी कस्बे में रहकर बड़े हुए, वहीं उनकी शादियाँ हुईं, बच्चे हुए। लेकिन जब हालादिनी पैदा हुई तब तक दो धार्मिक समूहों के बीच आपसी तनाव काफी बढ़ चुका था। अपहरण होते थे, लोगों को सड़कों पर घसीटकर सिर्फ इसलिए मारा जाता था कि वे हिन्दू हैं, पूरा परिवार सिर्फ दूसरे धर्म का होने की वजह से प्रताड़ित किया जाता था। परिवार खतरे में जी रहा था, एक बेहद हिंसक वातावरण में, जहाँ वे नहीं चाहते थे कि उनके बच्चे बड़े हों। लेकिन बहुत दिनों तक उनके सामने इसके अलावा और कोई विकल्प भी नहीं था।

लेकिन फिर कई दूसरे पाकिस्तानी हिंदुओं के साथ यह परिवार भी लंबे समय तक रहने का वीसा प्राप्त करने में सफल रहा और पर्यटकों के रूप में मुंबई आ गया। कुछ साल वहाँ बिताने के बाद उन्होंने वृन्दावन आने का निर्णय किया। वृन्दावन एक धार्मिक जगह है, जहाँ हर साल लाखों की संख्या में श्रद्धालु तीर्थयात्रा करने आते हैं और अपनी धार्मिक पृष्ठभूमि और धार्मिक ज्ञान की वजह से उन्होंने सोचा, उन्हें यहाँ रोजगार के अधिक अवसर उपलब्ध होंगे।

यहाँ वृन्दावन में, उनके माता-पिता एक चैरिटी ट्रस्ट द्वारा चलाए जा रहे वृद्धाश्रम में नौकरी करते हैं। यह वृद्धाश्रम अभी हाल ही में खुला है और बच्चों की माँ वहाँ रहने वाले वृद्धों और दूसरे कर्मचारियों के लिए खाना पकाती है, जब कि पिता एक तरह से, सारे वृद्धाश्रम की व्यवस्था देखता है। परिवार को भी एक बड़ा सा कमरा मिला हुआ है और स्वाभाविक ही, भोजन की व्यवस्था भी वहीं हो जाती है।

वे लोग इस काम के 5000 रुपए यानी लगभग 80 डॉलर प्रतिमाह वेतन पाते हैं-लेकिन हर साल अपने वीसा नवीनीकरण के लिए उन्हें मुंबई जाना पड़ता है, लिहाजा उस सालाना खर्च के लिए हर माह उन्हें बचत करनी पड़ती है। यह काफी बड़ी रकम होती है-रेल से मुंबई आने-जाने का खर्च, वहाँ रहने का और खाने-पीने का खर्च, वीसा-फीस और ऊपर से, माह भर में वीसा प्राप्त हो जाए, इसके लिए दी जाने वाली रिश्वत आदि मिलाकर काफी पैसा इसमें लग जाता है! फिर, उन्हें पता नहीं होता कि ठीक-ठीक कितनी रकम की आवश्यकता होगी, इसलिए वे पूरे साल ज़्यादा से ज़्यादा रकम बचाने की कोशिश करते हैं!

बारंबार स्कूल बदलने के बावजूद तीनों बच्चे पढ़ाई में अच्छे हैं। उनके माता-पिता विशेष रूप से बच्चों की शिक्षा पर ध्यान देने की पूरी कोशिश करते हैं! अब हमारे यहाँ, क्रमशः पाँचवी, चौथी और यू के जी में पढ़ रहे उनके बच्चे स्कूल आना बहुत पसंद करते हैं।

हमें भी उनकी मदद करते हुए अपार हर्ष हो रहा है। अगर आप बच्चों को शिक्षित करने के हमारे काम में हाथ बँटाना चाहें तो हमें और भी खुशी होगी! किसी एक बच्चे या बच्चों के एक दिन के भोजन को प्रायोजित करके आप इन बच्चों की मदद कर सकते हैं!

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