लड़के की आस में पांच लडकियां पैदा हो गईं – हमारे स्कूल के बच्चे- 8 नवंबर 2013

परोपकार

आज मैं आपको हमारे स्कूल में पढ़ने वाले एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं बल्कि चार बच्चों का परिचय करवाने जा रहा हूँ! वे सभी बहने हैं, एक ही परिवार की चार लड़कियां और हमें कुछ साल और इंतज़ार करना होगा जब सबसे छोटी यानी उनकी पाँचवी बहन भी हमारे स्कूल में पढ़ने आया करेगी। ये चार बच्चियाँ हैं: तेरह साल की ज्योति, बारह की संध्या, दस की काजल और सात साल की राखी, जो हमारे स्कूल में अभी पढ़ रही हैं। और पाँचवी है डेढ़ साल की राधिका, जो अभी अपनी माँ की गोद में पल रही है।

अगर आप ध्यान से देखें तो पाएंगे कि यह कई मानों में एक परंपरागत भारतीय परिवार का उदाहरण है। उनके अभिभावकों का विवाह 1998 में हुआ था-जब उनके पिता उन्नीस के और माँ तेरह बरस की थी। अब सबसे बड़ी बहन ही तेरह साल की है, जिसका अर्थ यह है कि जब वह पैदा हुई थी तब उसकी माँ सिर्फ पंद्रह बरस की थी! एक साल बाद ही दूसरी भी पैदा हो गई।

भारत में यह एक तरह का अलिखित नियम-सा है कि परिवार में कम से कम एक लड़का ज़रूर होना चाहिए। वे अपनी लड़कियों से भी प्रेम करते हैं लेकिन अगर उनकी पहली दो सन्तानें लड़कियां हैं तो मानकर चलिए कि वे लड़के की आस में तीसरी संतान अवश्य उत्पन्न करेंगे। यही बात इस दंपति के साथ भी हुई है। उन्होंने लड़के के लिए पाँच बार कोशिश की और सभी सन्तानें लड़कियों के रूप में ही पैदा हुईं। स्वस्थ, प्रसन्न और थोड़ी नटखट लड़कियां!

इस परिवार को हम काफी समय से जानते हैं क्योंकि लड़कियों का पिता मिस्त्री है और हमारे आश्रम और स्कूल के निर्माण के दौरान हमारे यहाँ काम कर चुका है। इसी स्कूल में आज उसकी बेटियाँ पढ़ रही हैं। शुरू से हमारी इच्छा थी कि इस गरीब व्यक्ति और उसके परिवार की हम मदद करेंगे। जब उसके पास काम होता है तभी परिवार का भरण-पोषण हो पाता है और जब कोई काम नहीं होता, निर्माण कार्य ठंडे पड़ जाते हैं तब उस विशाल परिवार के लिए भूखे रहने की नौबत आ जाती है।

सारी कमाई परिवार का मुखिया यानी लड़कियों का पिता ही रख लेता है, वह एक रुपया भी अपनी पत्नी को नहीं देता। वह सब्जी, चावल और मसाले आदि घर लेकर आता है। वह उनके लिए कपड़े खरीदकर लाता है और दूसरे ज़रूरी सामान परिवार को मुहैया कराता है। उसकी पत्नी कहती है: "मेरा काम घर की देखभाल करना, खाना पकाना और बच्चों का लालन-पालन करना भर है!"

दो साल पहले वह मिस्त्री कुछ रुपयों की बचत करने में कामयाब हो गया और एक प्लाट खरीदकर उस पर छोटा सा घर बनवा लिया। घर बनवा तो लिया मगर उसमें सिर्फ एक रसोई, एक बैठक और एक अतिरिक्त कमरा भर है, जिसमें पूरा परिवार सोता है। लड़कियां पड़ोसी बच्चों के साथ छत पर खेलती थीं। ज्योति अभी से रोटी, चावल और नूडल्स बनाना भी सीख चुकी है!

हर सुबह चारों बच्चे तैयार होकर स्कूल आते हैं। कई बार हम सोचते हैं कि अगर उनकी पढ़ाई मुफ्त नहीं होती तो क्या वे पढ़ पाते। क्या उनका पिता पाँच लड़कियों की पढ़ाई का खर्च उठा सकता था? शायद वह उस पैसे को बचाता और उनकी शादियों पर खर्च करता!

हम आशा करते हैं कि वे लड़कियां मेहनत के साथ पढ़ाई करेंगी और इतनी प्रतिभाशाली साबित होंगी कि स्वयं भी पैसा कमा सकें और अपने पैरों पर खड़ी हो सकें। हमें यह भी आशा है कि विवाह के बाद भी वे अपने पतियों पर आश्रित नहीं होंगी और आधुनिक मानसिकता के साथ अपने निर्णय स्वयं ले सकेंगी, जिसमें सबसे प्रमुख निर्णय होगा खुद के बच्चों की संख्या का निर्धारण।

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