निम्नांगों के पक्षाघात से पीड़ित पिता के पाँच बच्चे – हमारे स्कूल के बच्चे – 28 नवम्बर 2014

परोपकार

आज मैं अनुराधा, उसके परिवार और उसके पिता के बारे में आपको बताना चाहता हूँ, जिनके जीवन का स्तर उठाने में हमने भी थोड़ी-बहुत मदद की है। अनुराधा हमारे स्कूल में पढ़ने आती है। उसका घर आश्रम के ठीक पीछे स्थित है और उसका पिता शरीर के निचले हिस्से के पक्षाघात से पीड़ित है और जीवन की कठिनतम परिस्थितियों में जी रहा है।

अनुराधा का पिता, सुरेश एक मजदूर था। अपने पिता से उसने संगमरमर, ग्रेनाइट और दूसरे पत्थरों के फर्श के निर्माण का हुनर सीखा था। 2005 में उसने हमारे लिए आश्रम के रास्ते पर फर्श बिछाने का काम भी किया था।

और उसके एक साल बाद ही, 2006 में वह दुखद घटना हुई। अनुराधा उस समय 3 साल की थी, जब पुणे में, जो वृन्दावन से दिन भर की यात्रा की दूरी पर है, उसकी बुआ बीमार पड़ी। उसका पिता अपनी बहन को देखने अस्पताल (पुणे) गया। जब वह वहाँ था तो उसने सोचा कि कुछ दिन यहीं कोई काम करके यहाँ का खर्च पूरा किया जाए और सौभाग्य से उसे काम मिल भी गया। एक दिन एक निर्माणाधीन इमारत की, जोकि आम भारतीय निर्माण-कार्यों वाले स्थानों की तरह असुरक्षित थी, तीसरी मंज़िल पर काम करते हुए वह सहारे के लिए एक पत्थर पर टिक गया। पत्थर अभी ठीक तरह से पुख्ता नहीं हुआ था इसलिए दीवार से निकलकर तीन मंज़िल नीचे गिरा और उसके साथ अनुराधा का पिता भी पहले नीचे स्थित पोर्च के नुकीले किनारे पर पीठ के बल गिरा और उसके बाद ज़मीन पर गिर पड़ा।

तीन दिन बाद जब अस्पताल में उसे होश आया तो उसने देखा कि उसके पैर सुन्न पड़ चुके हैं और उनमें कोई हरकत नहीं है।

डॉक्टरों ने कहा कि अगर वह दो माह रहकर अपना इलाज करवा ले तो सम्भव है उसके पैरों की हरकत थोड़ी-बहुत वापस आ जाए, इतना कि संडास-बाथरूम तक खुद चलकर जा सके। लेकिन इलाज पर खर्च होने वाले 50000 ₹ यानी लगभग 810 $ वह कहाँ से लाता? इतनी रकम न जुटा पाने के नतीजे में आज वह जीवन भर के लिए अपने पैरों से लाचार, दिन-रात बिस्तर पर पड़ा रहता है।

और उसका सबसे बड़ा अवसाद और सबसे बड़ी निराशा यह है: बहन के विवाह के लिए पैसे जुटाने में उसने कड़ी मेहनत की थी, जब उनमें से एक बीमार पड़ा तो मदद के लिए इतनी दूर दौड़ा चला आया, जब भी किसी को सहारे की ज़रूरत पड़ी, हर तरह से उसकी मदद के लिए तत्पर रहा और आज जब उसे सहारे की ज़रुरत पड़ी तो उन्होंने पर्याप्त रकम जुटाने के लिए कोई प्रयास नहीं किया कि वह किसी तरह बिस्तर से उठ सके!

आखिर जब परिवार वृन्दावन वापस लौटा, ऐसा कुछ भी नहीं किया जा सकता था कि वह ठीक होकर फिर से कोई काम-धाम कर सके। वे जी रहे थे, यही बहुत बड़ी बात थी। उनके इस आड़े वक़्त पर हमने उनकी आर्थिक मदद की। जब उन्होंने अपनी बड़ी लड़की की शादी की तब भी हमने विवाह के कपड़े और दंपति के लिए कुछ उपहार वगैरह खरीदे। भोजन का खर्च निकल सके इस उद्देश्य से अनुराधा की माँ ने बाहर निकलकर काम करना शुरू किया। तीन किशोर लड़के एक रासलीला-मण्डली में शामिल हो गए, जहाँ उन्हें भोजन मिल जाता था और परिवार में भोजन करने वाले तीन लोग कम हो जाते थे। आज उसके बेटे धार्मिक कार्यक्रमों में प्रदर्शन करके कुछ पैसा कमाकर लाते हैं।

पिछले दो सालों से वह घर से बाहर नहीं निकला था-दरअसल, उसकी पुरानी व्हीलचेयर टूट गई थी लिहाजा अब उसका बाहर निकलना असंभव हो गया था। उनका घर सड़क की सतह से तीन मीटर नीचे है और वहाँ तक पहुँचने के लिए खड़ा ढालू रास्ता है। हम उस रास्ते पर काफी संभलकर चलते हुए उनके घर तक पहुँचे! स्पष्ट ही उसे कोई बाहर निकालकर खुली हवा में लेकर आए इसकी संभावना नगण्य थी! मगर अब दूसरे किसी व्यक्ति की मदद से अनुराधा का पिता बाहर निकलकर वहाँ, ऊपर तक आ सकता है और सार्वजनिक जीवन में हिस्सा ले सकता है और घर के दो कमरों की दीवारों के अतिरिक्त भी कुछ देख सकता है!

जबकि उसकी दुखद कहानी सुनना किसी यातना से कम नहीं है, यह सोचकर अच्छा लगता है कि हम शक्तिभर उसकी मदद कर पाए। अपने घर में हमें देखकर भावावेश में अनुराधा की आँखे भर आईं और उसने रोते हुए हमसे कहा कि आज तक उसने पिता को अपने पैरों पर चलते नहीं देखा। लेकिन जब पिता ने कहा कि कम से कम वह उसे ज़िंदा तो देख पा रही है, तो वह चुप हो गई-इससे भी बुरा कुछ भी हो सकता था!

ऐसे भयंकर हादसे से गुज़र चुके व्यक्ति के मुँह से ये शब्द सुनना वाकई बहुत सराहनीय है। हाँ, हमारा उपहार पाकर अनुराधा का परिवार बहुत खुश हुआ! दूसरे दिन वह अपनी तीन पहियों वाली ट्रायसिकल पर सवार होकर आश्रम आया। उसे बाहर, सूरज की रौशनी और खुली हवा में टहलते घूमते देखना वाकई हमारे लिए ख़ुशी और संतोष की बात थी!

हम और भी ज़रूरतमंद लोगों को ऐसी मदद पहुँचाना चाहते हैं! आप भी इस काम में हमारी मदद कर सकते हैं! हमारे स्कूल के बच्चों के एक दिन के भोजन को या ऐसे ही किसी गरीब बच्चे को प्रायोजित करके-या फिर हमें चंदा देकर! हम और हमारे ये बच्चे आपको दिल की गहराइयों से अग्रिम धन्यवाद प्रेषित करते हैं!

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