बच्चों को खाना खिलाएँ या दवाई खरीदें? हमारे स्कूल के बच्चे- 21 फरवरी 2014

आज फिर मौका है, अपने स्कूल के किसी बच्चे से आपको मिलवाने का! आज एक लड़का होगा, जिसने अभी पिछली जुलाई से ही हमारे स्कूल में पढ़ना शुरू किया है: वह दस साल का है और, हमारे दूसरे सभी बच्चों की तरह, एक ऐसे परिवार से आता है, जो गरीबी में जीवन बिताने पर मजबूर हैं।

जब हम उस गली में पहुंचे, जहां वे लोग रहते हैं तो हमने बहुत से बच्चों को सड़क पर खेलते देखा। एक महिला हमारे नजदीक आई और इस उत्सुकता से हमारी तरफ देखा कि हम कौन हैं और यहाँ क्या करने आए हैं। जैसे ही हमने उन्हें बताया कि हम योगेश के स्कूल से आए हैं तो सब हमारे स्कूल की तारीफ करने लगे और पूछने लगे कि क्या हम उनके बच्चों को भी अपने स्कूल में ले सकते हैं। वे सरकारी स्कूलों की, जहां फिलहाल उनके बच्चे पढ़ रहे हैं, बुराई कर रहे थे क्योंकि उनके अनुसार, वहाँ उनके बच्चे हर साल अगली कक्षा में पहुँच जाते हैं मगर उनके ज्ञान में कोई बढ़ोतरी नहीं होती। हमने उन्हें 2014-15 में होने वाले नए दाखिलों के लिए नियत दिन की जानकारी दी और फिर योगेश से अपने घर ले चलने को कहा।

योगेश अपने तीन सहोदरों में सबसे बड़ा है। उसके एक छोटा भाई और एक बहन हैं, जो क्रमशः छह और लगभग पाँच साल के हैं। हमें देखकर बच्चे खुशी से उछल पड़े। वहाँ देखने के लिए विशेष कुछ नहीं था- परिवार के पास एक कमरा, एक रसोई और एक आधा बना हुआ हाल है, जहां से होकर घर में प्रवेश किया जाता है; शायद पहले उसे पूरा करने का विचार रहा होगा, जिससे एक और कमरा उपयोग के लिए उपलब्ध हो जाता। सामने का पोर्च, जहां बैठकर हमने बातें कीं, नहाने-धोने और गोबर के कंडे सुखाने के काम आता है। कंडे जलाने के काम आते हैं। वह दीवार, जो घर को सड़क से अलग करती है, पूरी तरह तैयार नहीं है और दरवाजे की चौखट दीवार के ऊपरी हिस्से तक खुली पड़ी है।

सारी दीवारें योगेश के दादा ने बनवाई थीं। वह राजमिस्त्री था, जैसा कि अब उसका बेटा भी है, लेकिन अपने परिवार के लिए बनाए जा रहे मकान की दीवारें वह पूरी नहीं कर पाया। अब योगेश की दादी परिवार के पाँच सदस्यों को लेकर वहाँ रहती है और सारे सदस्यों का पेट भरने का जिम्मा योगेश के पिता के कंधों पर आ गया है। मगर यह बोझ बहुत भारी है- विशेषकर इसलिए कि वह मधुमेह से पीड़ित है और अक्सर काम पर जा ही नहीं पाता!

वह एक डॉक्टर के पास गया था और उससे दवाइयाँ ले आता है लेकिन तभी जब उसके पास रुपया होता है! इसका अर्थ यह है कि जब वह स्वस्थ होता है और काम कर पाता है तब उसे कुछ आमदनी हो जाती है और फिर पहले वह परिवार के लिए भोजन का इंतज़ाम करता है और अगर कुछ रुपए बच गए तो फिर दवाइयाँ खरीदता है। अगर पर्याप्त रुपया बच नहीं पाता तो दवाइयाँ नहीं लेता। बिना दवाइयों के वह अक्सर बीमार और कमजोर महसूस करता है और काम करने में असमर्थ हो जाता है- और तब आमदनी का कोई जरिया नहीं होता। उनके जीवन में यह कुचक्र लगातार बना रहता है और वे भरसक उसका सामना करने का प्रयास करते हैं।

जिस बात से वे निश्चिंत और प्रसन्न हैं, वह है: योगेश की पढ़ाई का खर्च उन्हें नहीं उठाना पड़ता। न तो फीस देनी पड़ती है और न ही किताब-कापियों पर कोई व्यय होता है। इसके अलावा एक अच्छे स्कूल में ढंग से पढ़ने की सुविधा भी उसे उपलब्ध हो जाती है। और सबसे बड़ी बात, मुफ्त स्वादिष्ट खाना भी उसे यहाँ प्राप्त होता है।

योगेश को यहाँ का भोजन बहुत पसंद करता है! वह अभी हमारे स्कूल की पहली कक्षा में पढ़ रहा है और जब उससे पूछा गया कि स्कूल की कौन सी चीज़ उसे सबसे अच्छी लगती है तो उसका उत्तर था: खाना! उसकी शिक्षिकाएँ बताती हैं कि वह पढ़ाई में भी रुचि लेता है- तो हम देखना चाहते हैं कि अगले सालों में वह कितना कुछ लिख-पढ़ पाता है!

आप भी योगेश जैसे बच्चों की मदद कर सकते हैं! एक बच्चे को प्रायोजित करके या बच्चों के एक दिन के भोजन का खर्च वहन करके!

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