सब्जियाँ तो घर में बहुत हैं मगर और कुछ खरीदने के लिए पैसे नहीं – हमारे स्कूल के बच्चे! 21 नवंबर 2014

आज मैं आपका परिचय अपने स्कूल के तीन बच्चों से करवाना चाहता हूँ, जिन्होंने इसी साल से हमारे स्कूल में पढ़ना शुरू किया है। ये हैं 13 साल की पूनम, 12 साल का राहुल और 6 साल का सोनू। सोनू अपने छह भाई-बहनों में सबसे छोटा है।

उनका पिता आश्रम के पास एक ठेले पर सब्जियाँ और फल बेचता है। आप कल्पना कर सकते हैं कि यह काम ऐसा नहीं है जिसमें ज़्यादा कमाई हो सके। अगर अच्छी बिक्री हो जाती है तब तो आपको पर्याप्त पैसे मिल जाते हैं, अगर नहीं तो आपके पास बहुत सारी सब्जियाँ पड़ी रह जाती हैं, जिन्हें आप खाने के लिए घर वापस ले जा सकते हैं-लेकिन फिर आपके पास कपड़े-लत्तों और दूसरी ज़रूरी चीज़ें खरीदने के लिए पैसे नहीं हो पाते! छह बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाने की बात तो छोड़ ही दीजिए!

इसके बावजूद उनके माता-पिता ने हर तरह के उचित प्रयास किए: उन्होंने ठान लिया कि उनका बड़ा लड़का स्कूल अवश्य जाए और अब वह 7 वीं कक्षा तक पढ़ चुका है। इस समय वह 18 साल का है और सब्जियाँ बेचने में अपने पिता की सहायता करता है। दूसरा बच्चा एक 17 साल की लड़की है, जो अभी भी स्कूल जा रही है। तीसरी, 15 साल की एक और लड़की है, जिसने स्कूल जाना छोड़ दिया है। वह एक सरकारी स्कूल में पढ़ने जाती थी-मगर वहाँ ठीक पढ़ाई नहीं होती थी। जब हमने पूछा कि वह भी अपनी बड़ी बहन की तरह निजी स्कूल में पढ़ने क्यों नहीं गई तो उसने बताया कि उसके पिता के पास इतने पैसे नहीं थे कि वह सब को स्कूल भेज सके।

यही कारण है कि पूनम और राहुल, जो दोनों ही उसी सरकारी स्कूल में पढ़ने जाते थे, अपनी उम्र के लिहाज से खास कुछ सीख नहीं पाए हैं। और उन्हें निजी स्कूल में भेजने के लिए परिवार के पास पैसे ही नहीं थे।

परिवार को सिर्फ बच्चों के कपड़े-लत्तों और उनके खाने-पीने का खर्च ही नहीं उठाना पड़ता! जिस ज़मीन पर वे पिछले 25 साल से रह रहे थे वह भी उन्होंने खरीद लिया था। जब खरीदा था, वहाँ एक ही कमरा था। एक के बाद एक उन्होंने तीन और कमरे, नीचे एक हाल और ऊपर जाने के लिए सीढ़ियाँ बनवा लिए और हर बार उन्हें पड़ोसियों और रिश्तेदारों से कर्ज़ लेना पड़ा। इतने सालों से यही क्रम रहा कि एक कर्ज़ उतारते थे और अगला कमरा बनवाने के लिए दूसरा ले लेते थे। तो, इस तरह परिवार की कमाई का एक बड़ा हिस्सा कर्ज़ की किश्तें भरने में भी चला जाता है।

जीवन भर पैसे की इस स्थायी समस्या से जूझते रहने के कारण जब परिवार ने हमारे स्कूल के बारे में सुना तो उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। अब ये तीन बच्चे हमारे यहाँ पढ़ाई कर रहे हैं-और इस पढ़ाई पर परिवार को एक रत्ती खर्च नहीं करना पड़ता!

किसी एक बच्चे को या स्कूल के बच्चों के भोजन को प्रायोजित करके आप भी उन जैसे बच्चों की मदद कर सकते हैं!

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